बुधवार, 25 सितंबर 2013

टपके आँसू ... देश-परदेश में

टपके आँसू ... देश-परदेश में

आसमान में



उड़ रहे थे  
काले-काले 
गुब्बारे ।

और
धरती पर  
दहशत  
फैली थी।

छितरे   थे
चप्पल- चश्मे
अधजली कारें
झुलसे चेहरे
कार की
लावारिस चाभी। 
सर कहीं
और पैर
कहीं थे ।
बाहें दूर
छिटक गईं थी।
धरों के आकार
 कई थे
रंग भरे थे
कपड़ों  पर
 एक जैसे-ही
चीखने-चिल्लाने
और 
रोने की आवाज 
एक जैसी- थी।

ऐसे में
किसकी जुबान ?
किस कौम का ?
रंग और धर्म 
ढूंढना
बेमानी  ही था ।

किस मकसद से
मानवता के
इस संगम को
दफनाने का
अभ्यास किया था ?
जहन में यही था।

तड़के ही जब
लगे निकलने
लाल-लाल
गुब्बारे

बड़े फक्र से
मौत का खेल 
दिखाने वाले
मदारी की
एक जमात ने
इस  
विनाश –लीला की
जिम्मेवारी ले ली 
lटपके आँसू ... देश-परदेश में...
और
लोगों में
छायी थी खामोशी... 
आक्रोश और सपने
नहीं हूए थे
ठंढे ...

जली मोमबत्तियाँ...
टपके आँसू
देश –परदेश में।













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