टपके आँसू ... देश-परदेश में
आसमान में
उड़ रहे थे
काले-काले
गुब्बारे ।
और
धरती पर
दहशत
फैली थी।
छितरे थे
चप्पल- चश्मे
अधजली कारें
झुलसे चेहरे
कार की
लावारिस चाभी।
सर कहीं
और पैर
कहीं थे ।
बाहें दूर
छिटक गईं थी।
और
रोने की आवाज
एक जैसी- थी।
ऐसे में
किसकी जुबान ?
किस कौम का ?
रंग और धर्म
ढूंढना
बेमानी ही था ।
किस मकसद से
मानवता के
इस संगम को
दफनाने का
अभ्यास किया था ?
तड़के ही जब
लगे निकलने
लाल-लाल
गुब्बारे
बड़े फक्र से
मौत का खेल
दिखाने वाले
मदारी की
एक जमात ने
इस
विनाश –लीला की
जिम्मेवारी ले ली
lटपके आँसू ... देश-परदेश में...
और
लोगों में
छायी थी खामोशी...
आक्रोश और सपने
नहीं हूए थे
ठंढे ...
जली मोमबत्तियाँ...
टपके आँसू
देश –परदेश में।
आसमान में
उड़ रहे थे
काले-काले
गुब्बारे ।
और
धरती पर
दहशत
फैली थी।
छितरे थे
चप्पल- चश्मे
अधजली कारें
झुलसे चेहरे
कार की
लावारिस चाभी।
सर कहीं
और पैर
कहीं थे ।
बाहें दूर
छिटक गईं थी।
धरों के आकार
कई थे
रंग भरे थे
कपड़ों पर
एक जैसे-ही
चीखने-चिल्लानेऔर
रोने की आवाज
एक जैसी- थी।
ऐसे में
किसकी जुबान ?
किस कौम का ?
रंग और धर्म
ढूंढना
बेमानी ही था ।
किस मकसद से
मानवता के
इस संगम को
दफनाने का
अभ्यास किया था ?
जहन में यही था।
लगे निकलने
लाल-लाल
गुब्बारे
बड़े फक्र से
मौत का खेल
दिखाने वाले
मदारी की
एक जमात ने
इस
विनाश –लीला की
जिम्मेवारी ले ली
lटपके आँसू ... देश-परदेश में...
और
लोगों में
छायी थी खामोशी...
आक्रोश और सपने
नहीं हूए थे
ठंढे ...
जली मोमबत्तियाँ...
टपके आँसू
देश –परदेश में।



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