सोमवार, 30 दिसंबर 2013

. विस्मृति

विस्मृति

प्रस्तुत है एक रचना.. विस्मृति.प्रेमकुमार

ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
घने बालों के साये में  ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
आँखों के पलकों में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
साँसों के प्रवाह  में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
मुस्कान के घेरे में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
दिल के एक कोने में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
कदमों की आहट में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
गीत के एक बोल में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
मन के आँगन में ।
पर तुम कहती हो –
मुझे कुछ याद नहीं ।
यह कैसी विडम्बना है !
मेरी ढेरों - ज़िंदगी का
तुम्हारे पास हिसाब नहीं !

 30/12/2013




सोमवार, 23 दिसंबर 2013

… दिल्ली का सिंहासन....




दिल्ली का सिंहासन

बड़ी बात हो गयी
आप की सरकार हो गयी ।

बिल घटेगा बिजली पानी का
उम्मीद जगा है जन –जन का ।

जन –लोकपाल बिल बनेगा
भ्र्रष्टाचारी कालिख मलेगा ।

वैशाली लौटी है दिल्ली
जनता सिंहासन पर बैठी ।

दल –दल क्यों बेदखल हो गए ?
नहीं समझ पा रहे हैं कोई ।

चिंतन –मनन  वे कर रहे हैं
घाट –घाट के पानी जो पीये हुए हैं ।

साध रखी है गुरु ने चुप्पी
गुर यह कोई और भी सीखेंगे ।

कोई कहते, टांग हम खीचेंगे ही
सिंहासन पर हम बैठेंगे हीं ।
भारत भाग्य विधाता हैं हम
जनता को  यह समझा देंगे ।

चमकेगा जहाँ सितारा उनका
आसमान वह दिखला देंगे ।


23/12/2013


रविवार, 8 दिसंबर 2013

.. कीचड़ –भरी झील ..



 कीचड़ –भरी झील


 

जुगनू जिसे समझा था,

वह   ज्वाला  निकली ।

समझा था जिसे अबला ,

वह  दुर्गा      निकली ।

मोम की पुतली नहीं ,

कड़कती बिजली निकली ।

मछ्ली थी नहीं  रंगीन ,

काँटों भरी ह्वेल  निकली ।

छोटी – सी बात नहीं

कालिख –पुती कहानी निकली ।

थिंक टैंक की तहक़ीक़ात में

कीचड़ –भरी झील निकली ।

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

: परमात्मा!...


परमात्मा!


अच्छा हुआ , हमने किया,
बुरा   हुआ , परमात्मा!

लड़का  हुआ , मेरा  हुआ ,
लड़की  हुई  , परमात्मा!

धन कमाया , खूब मैंने ,
लूट  गया , परमात्मा!

फसल बोया , तो हमने,
सूख गया   , परमात्मा!

बांध  तो , हमने बनाया ,
बाढ़  आई , परमात्मा!

सफर तो हमने किया ,
हादसा हुआ , परमात्मा !

सांस मेरी चल रही है ,
रुक गयी , परमात्मा!

दोष सबका    लेने को,
होता है , परमात्मा!

जो हमसे न हुआ ,
करेगा वह परमात्मा !



04/12/2013

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

जन्म-दिन : एक और नज़र मेँ :

जन्म-दिन : एक और नज़र मेँ
                 प्रेमकुमार


जिन्दगी की
किताब का
एक
और पन्ना
पलट गया
हवा के
झोंकों से

जिन्दगी के
आईने मेँ
एक
और चेहरा
खो गया ।

मुरझाए
फूलों मेँ
एक
और गुलाब
समा गया ।

यादों की
लहरों को
एक और लहर
छू गयी ।

रात एक
कट गयी
सुबह के
होने मेँ
आयी जब सुबह
वह
हाथ से
फिसल गयी ।

बुझी हुई
मोमबत्तियों के
आँगन मेँ
जला दिया
एक और ...
बुझने के लिए
मोमबत्ती !


29/11/2013
  https://sites.google.com//site/abhiwyktikavitaonkemadhyamse/
     https://sites.google.com//site/balbrindkeliyerachnayen/


गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

जीवन-संदेश

जीवन-संदेश


फूल और कांटे है जीवन में
कर्म –अधीन है जीवन सारा ।
मिलता नहीं फल सर्वदा कर्म का ।
नहीं कहो यह विडम्बना है नियति का ।
नियति तो पथ पर बढ़ना है ।
देखते जाओ सपने फूलों  के
काँटों को उखाड फेकना है ।
निराशा की जब बदली छाए
इंद्र-धनुष उसमें ढूंढो तुम ।
डगमगाये जब जीवन –नौका
हिम्मत की पतवार संभालो ।
दायित्व  के जो बोझ उठाते
पथ पर पुष्प बरसते हैं उनके ।
जीवन-संदेश यही हमारा ।




कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को ?

कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को ?

कोख में पलती बिटिया को

जीवन मुक्त कर देता है रावण ।                 
छूटी नहीं मेंहदी हाथ की
चिता सजा कर रख लेता है ।
बन कर श्रवण मात-पिता के
बैकुंठ- धाम भिजवा देता है।
फंसा कर चंगुल में जानकी को
ख़ुदकुशी का तोहफा देता है ।
जहर फैला कर भेद-भाव का
घर एक-दूसरे से जलवा देता है ।
बाजार गरम कर अफवाहों का
भगदड़ बन कुचल देता है ।
सभी धर्म के पवित्र कुंड में
बारूद का शोला रखता है ।
कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को
रक्त-बीज –सा पैदा होता है ।
काम-क्रोध-मोह-लोभ का रावण
रूप अनेक संवार रहा है ।
कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को
हम –सब में अब समा गया है ।












बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

गुड़िया का निकाह


गुड़िया का निकाह


साथ गयी थी
अब्बू के
मेला घूमने
फूफी के घर
शहर में ।

देखा जेवर -
चमकदार कपड़े-
खी फूफी ने
सामने उसके
सज-धज कर
दरगाह जाना है
अल्लाह की दुआ
लेनी है –
कहा यह
फूफी ने उससे ।
सोचा उसने
अम्मी से
फूफी अच्छी है !

बहाना था केवल
नमाज का ।
सहमी-सी
उस बेजान को
निकाह कबूल
करवाया उसने ।
बैठा था
काजी के सामने
मालदार जो
सा साल का ।
इर्द-गिर्द
फैली –थी खुसबू
त्र-फूलैल की ।
बिना घुमाए शहर
रुखसत किया
समझा-बुझा कर
अनजान गुड़िया को।
गाँव आकर
दावत की
तैयारी कर ली ।
लगा फटने
माँ का दिल जब
तलाक की
धमकी देकर
श्न का माहौल
बनाया ।
सुना जब
दूसरे  के अब्बू ने -
ऐसी किस्मत
निकली उसकी
सैर करेगी
हवा में।
तैयार हो गया
दूसरा अब्बू
गुड़िया का निकाह
करने को
लिया पता
उसकी फूफी का ।












सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

मंदोदरी –विलाप: नहीं मारा था राम ने तुमको !

मंदोदरी –विलाप: नहीं मारा था राम ने तुमको !

कर रही थी विलाप
मंदोदरी
कटे सिर लिए
गोद में
रावण के ।
रण-भूमि
लहू-लहान थी
शवों के ढेर से ।

तीन –लोक
जिसने जीता हो ?
ग्रह-गोचर
वश में हो जिसके ?
धन-कुबेर
बा जोहते हों।
हाथ जोड़े
बंदी हो
देवगण ।
काल करे
पहरेदारी जिसकी ।
वेद-शास्त्रों के
पारंगत ।
अस्त्र-शस्त्र-सिद्ध
भुज-बल हों ।
ज्योतिष-शास्त्र के
प्रकांड पंडित को
क्या नहीं ज्ञात हुआ
काल अपना ?
नाथ ! किया था
विनती बहुतेरी ।
सीता नहीं
साधारण नारी ।
राम कोई
पुरुष नहीं हैं ।
नारायण का
रूप धरे हैं ।
धरती-पुत्री सीता
लक्ष्मी का ही स्वरूप है ।
यह सुन कर
ठोकर मारा था-
दुर्बलता है गुण
नारी का -
कह कर यह
अहठ्ठास किया
और दरबार
चले गए ।
तभी
भान हो गया
मुझको-
विनाश –काल
आ गया हमारा ।
अमरत्व के
नाभि-कुंड में
विष
समा गया था
अहंकार का ।
नहीं मारा था
राम ने तुमको ।
अहंकार का
बाण
तुम्हें  लगा था !












रविवार, 13 अक्टूबर 2013

..माँ दुर्गा नवमें स्वरूप में ... माँ सिद्धिधात्री


माँ सिद्धिधात्री  

जगदम्बा
आदि शक्ति ने
की थी कल्पना
सृष्टि रचने की ।
जल ही जल था
उसमें निकला
एक कमल था ।
प्रकट हुए जब
ब्रह्मा जी उससे
भार सौंप दिया
उनको सृष्टि
रचने का।
जग का पालन
करेंगे विष्णु ।
शिव संहार करेंगे
विघ्न-बाधाओं का।
प्रकट हुए
शिव और विष्णु
आदि शक्ति
माँ की इच्छा से ।
माँ  का कार्य
महा-विकट है
जब यह जाना
ब्रह्मा ने
डूब गए वो
गहन –चिंतन में


किया परामर्श
शिव –विष्णु से ।
नर-नारी के अभाव में
होगी कैसे यह सृष्टि ?
उठा यह प्रश्न
उनके मन में ।
गए शरण
वो माँ के।
असमंजस में देख
ब्रहमा को
आदिशक्ति ने
अपने अंश से
किया प्रकट
माँ सिद्धिधात्री को
और व्यक्त की
अपनी इच्छा-
यदि शिव करेंगे
साधना
इस देवी की
सारी सिद्धि
प्राप्त होगी शिव को ।
मार्ग प्रशस्त होगा
सृष्टि – रचना की।

महान साधना
जब शिव ने की
सिद्धि –सारी
प्राप्त हो गयी ।
कर दिया परिवर्तित
शिव के आधे-शरीर को
नारी- रूप में ।
अर्धनारिश्वर बने शिव ।
दिया सहयोग
ब्रह्मा को शिव ने
जगत रचने में।

माँ का रूप है बड़ा मनोहर ।
आसीन हैं कमल-पुष्प पर
चार –भुजाओं में सुसज्जित
गदा –चक्र , शंख –कमल है।
नव –रूपों की अंतिम देवी
नवमें दिन पूजी जाती हैं।
सिद्धि प्राप्त करते जो साधक
बहुजन हिताय की धारणा से
ज्ञान- गगन में करते विचरण
जनमानस आलोकित होता है ।