सोमवार, 9 सितंबर 2013

यही निवेदन है अब तुमसे !




यही निवेदन है अब तुमसे !
बाँहों में
  अपनी
बांधों तुम अब
कहीं कंटीले
नागफनी से
बंध जाऊंगा ।
इन मायावी
आँखों से
तुम अब न देखो
आहत मन के
जख्म
लहलहा उठेंगे ।
घने काले बालों से
छाँव की आस
अब  मत दो कोई
मरुभूमि में
अब ये बादल
नहीं बनेंगे ।
उठती-गिरती
इन पलकों से
नया ख़त
लिखो न कोई
रेत पर लिखे
सारे ख़त मेरे
पढ़- पढ़ कर तुम
लहरों से सब
मिटा चुकी हो ।
अपने अधरों को
मौन ही
रहने दो तुम अब
राधा के वे बोल
नहीं
बोल  पाएंगे वे ।
हल्की-हल्की
धीमी-धीमी
अपनी साँसों से
मत जगाओ
मेरी साँसों को
भूल गयी हैं
वे अब
एहसास  साँसों का
यही निवेदन है अब तुमसे !
तुम से यही निवेदन है अब !


तुम से यही निवेदन है अब !

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