शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

आशियाना



आशियाना

सुकून के लिए
आया
सागर तट पर
बनाया  फिर
एक  नया आशियाना -
बालुऔं से
बदरंगे घोंघों
और चमकती
छोटी-बड़ी सीपों से ।
डूबती किरणों ने 
देखा आशियाना
रंग दिया  उसे
अपने रंगों से...
हवा के झोंकों ने
खिड़की बनायी
भर दिया उसे
अपनी यादों से...
टिकटिकी बांध
देख रही थीं लहरे
सँजो दिये उसने
अनवरत
संगीत के फेरे ।
फिर कहाँ जाऊं
उस रक्त- रंजित
शहर में
जहां जल रहें हैं
एक-दूसरे के
आशियाने !





आप-बीती


आप-बीती


सुबह- सुबह
गली के नुक्कड़ पर
जब
परचून की दूकान
खुली नहीं थी
हलवाई का चूल्हा
जला नहीं था
रिक्शा स्टैंड
खाली था
लावारिस कुत्तों ने तब
एक सभा की..।
रिक्शा ऑटो और
कारों की
रुकती नहीं एक सेकंड भी
आवाजाही
अब खड़े होने की
जगह कहाँ है. गली मेँ ।
लोगों का स्वभाव
बिगड़ गया
नाले तक घर
बढ़ा लिया है ।
खाने को तो
लाले पड़ गए
शनिवार को छोड़
डालते नहीं हैं
कोई   रोटी
और उस दिन भी
रंग-भेद है
ढूंढते हैं
हम मेँ से कौन है काला !
सब तो मालामाल हो गए
पैसा सबके पास हो गया
ले रक्खी है गाड़ी सबने
घड़ी- घड़ी गेट खुलता है
दुतकारते है
उठना पड़ता है !
तीज- त्यौहार।
छेका-छेकी
शादी-ब्याह
और जन्म-दिन का जश्न
होता है
होटल और क्लब मेँ।
कभी-कभार
गली से कोई
लंबी यात्रा को जाता है
होता है ब्रह्म-भोज
और मिलता है भोजन ?
ऐसे गये-गुजरे नहीं
की अशुभ –घड़ी
का इंतजार करेंगे ।
ऐसे मेँ एक नया
तेज- तर्रार
पिल्ला बोला-
छोटा हूँ, इस कारण
मेरी बात
अन्यथा न लेना ।
त्यागो
इस गली के
मोह –माया को
कुछ दूर पर
बड़े नाले के पास
बस रही है
झुग्गी-झोपड़ी
आधार- कार्ड वालों की ।
पान दूकान पर
बड़ी चर्चा है...
कान लगा कर
मैंने भी सुना
पनवारी की दूकान पर
खाना ज्यादा वहीं मिलेगा
फूड बिल उनका पास हो गया ।






गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हे गोविंद ! आओ शरण

हे गोविंद ! आओ शरण ।

हे गोविंद !
आओ शरण ।
नया युग
दिखाऊँगी ।
माखन मिश्री से
ऊब गए  तुम
कटलेट  भोग लगाऊँगी ।
यमुना गंगा
तो हो गयी मैली
मिनरल वाटर पिलाऊँगी ।
ग्वाल-बाल संग खूब घूम लिए
मेट्रो में सैर  करवाऊँगी
लंच-डिनर की फिक्र नहीं अब
पाँच सितारा होटल में
अन्नकूट  मनाऊंगी ।
गोपियों को
अब कहाँ ढूंढोगे
गोवा –तट पे
रास नया  रचाऊंगी ।
बंसी तो खूब
बजा  चुके तुम
वेस्टर्न  म्यूजिक सुनवाऊंगी ।
डगर-डगर कहाँ जाओगे
पवन-हंस से
द्वारका पहुंचवा दूंगी ।
मीरा के गिरधर गोपाल
हे यशोदा नन्दन !
आदि-अनन्त हो
पर हो  अवतारी
जब जी चाहे
पधारो
द्वार म्हारो ।
इतनी-सी
विनती रख लेना
मीडिया को
खबर मत देना ।
न मना पाऊँगी तब
जन्म दिन तुम्हारा !
भीड़ लग जाएगी
संत-महात्मा –पंडा
सब एक हो जाएंगे
अपनी धरोहर समझ
उठा ले जाएंगे...









सोमवार, 26 अगस्त 2013

जन्माष्टमी




जन्माष्टमी
हे प्रभु !
आपकी छोटी-छोटी
मूर्तियाँ से बाज़ार
सज गया है।
परंपरा से ग्रसित
मैंने भी एक मूर्ति ले ली
अपनी औकात के मुताबिक ।
उपवास करूंगा
पर मन खिन्न है
हर गली में कंस है
साथ उसके जरासंध की

जमात है
नन्दन के अपहरण
से देवकी विक्षिप्त है
गोपियो पर गुलाल नहीं
एसिड का छिड़काव है
कुंजवन में द्रोपदी
वस्त्रहीन होती हैं
पितामह अपनी
कुलवधू की चिता
सजाते हैं
यशोदा के यहाँ
अब अनाथ बच्चे पलते हैं।
कोख में ही कलियाँ
मसल दी जाती हैं
राधिका बंशी की तान से
बहका ली जाती हैं
और सुदामा पीठ पीछे
वार करते हैं ।
बलराम अपनी गदा

के शिकार होते हैं



फिर भी मैं
उपवास करूंगा
पूजा अर्चना करूंगा...
आस्था न कम होगी मेरी ...
धर्म की हानि जब
पूरी\ होगी
ग्लानि से जब डूब जाऊंगा..
अभ्युदय होगा प्रभु का
भादों की अष्टिमी को



रविवार, 25 अगस्त 2013

स्वागत

स्वागत
द्वार पर खड़े हैं
हल्के- पीले–मखमली
केना के अनेक फूल
आरती उतारने ।
छींट रहे हैं अक्षत
जुगनू जैसे गुलाबी फूल ।
बाँहों में समेटने को आतुर हैं
केले के ये चिकने पात ।
चिलचिलाती धूप में
छाँव फैलातीं हैं
नेनूया के डिजाइनदार
बेल से लगी पत्तियाँ ।
आगुंतक का पदचाप
पहचान लेती है जेनी
स्वागत करेंगी –
इस  Small Wonder  में आपका
रानु – और प्रिया
क्या  माँ  और बेटी-?
नहीं- नहीं
सखी-सहेली जैसी ।
और प्रदीप ?
लगे होंगे
कितने घरों के
सपने सजाने में।











     

रूठ गयी थी बिजली


रूठ गयी थी बिजली


आज का दिन
अच्छा नहीं बीता ...
रूठी गयी थी
घर की बिजली
मान- मनौवल
बहुत किया
फिर भी  वह मुंह   नहीं दिखाई
इंवर्टर को  गुस्सा तब आया
मैं क्यों करूँ बेगारी ।
तभी  रानू का
फोन आ गया
कर लो चेक
ई-मेल अपना
लैपटाप ने जब सुना
सो गया -
वह भी गहरी  नींद में ।
ऐसे में मैं
फिर क्या करता ?
सरकारी क्वार्टर में क्या
गोबर गॅस का प्लांट लगाता  ?





शनिवार, 24 अगस्त 2013

प्रिय का आगमन

प्रिय  का आगमन


बड़े वेग से लहरें आईं
तट छूकर वे चली गईं
बादल आए  उमड़-घुमड़ कर 
सोंधी –सोंधी महक  फैल गयी
सुबह की किरणें बिखर-बिखर कर
कमलों पर मोती उगा गईं
और सांझ चुपके से  आकर
सोयी हेना जगा गयी
रात की आहट पाकर
कलियाँ\ मुस्कुरा उठीं
ऐसा ही कुछ हुआ था
तुम्हारे आगमन पर ...







शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मेढकों की चिंतन बैठक

मेढकों की सभा हुई थी ..
हर जगह से वे पधारे थे
रंग बिरंगी वेशभूषा में ...
कालीन और दरी बिछी थी
दरियों पर  मेहमान विराजे
कालीन पर इक्के-दुक्के ही थे
तब आया काफिला मेढकी रानी का
फिर तो कालीन भर  गयी
जय-जय गान शुरू हुआ
मेढकी रानी गद गदा गयी...
चिंतन बैठक शुरू हो गयी
सबों ने कुछ-कुछ कहा
पर एक तो मौन ही रहा
सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हुआ
छोटी आँखों  से सबने बड़ी दुनिया देखी है
अब वक्त आ गया
संसार  बचाने  का
रंग-रूप भूल कर साथ हो जाने का ...
अभी-अभी अंधकूप से निकला
वह सफेद  नवसीखुवा
मेढक
बहुत टर टर्रा है...
मजमा जमा रहा है
नन्हें-नन्हें को बरगला रहा है
खतरे की घंटी बजा रहा है ...
सभा में आए छोटे बड़े
सभी मेढक एक साथ मिल कर
टर- टारने लगे ...
एक खास प्रतिनिधि ने
कानों में कुछ कहा
महारानी से
सबको   अपना परिवार
प्यारा है
हम सब एक हैं।
चिंता की कोई बात नहीं
अबसे हम टर -टारते रहेंगे
हर हथकंडे अपनाते रहेंगे
उसकी बोलती बंद करेंगे
रानी की जय -जयकार हुई
चिंतन बैठक समाप्त हुई ।

प्रिय का संवाद

प्रिय का संवाद
प्रिय
संवाद मिला
सागर से
मोती मिला
मन का कमल खिला
चलचित्र-सा बीता पल
घू....म.......ने  लगा

क्या- क्या याद करूँ
उन पलों का
दिवस  -साल में जो बदल गए
शिकवा......शिकायत का
समय नहीं.. अब
शाम  ढलने को है
ऐसे में
संवाद तुम्हारा
आह्लाद का संचार कर गया ।
आनंद बरसे
झम -झमा –झम
जीवन के हर कोने में
यही है दिल में ।









राखी

राखी

(1)

सरहद.पर  डटे
जवान को
मिली है राखी 
सदेशा है बहन का
भर-पूर लड़ो भाई
मिशाइल बनेगी
तुम्हारी कलाई
मान रखना
भारत माँ का
आँखों में आँसू
दिल पत्थर कर
लिखी थी बहना ।


 (2)

 
जिस तट की रक्षा करते थे
तुमने कहा  वह बदल गया है
पता बदला, भेजी राखी ...
पूनम रात तक
नहीं मिले तो
रेत कणों का तिलक लगा कर
बांधेगी लहरें राखी ।

(3)



आसमान के ऊपर से


गर्जन करता
गिद्ध जैसा कोई वाहन
जब गुजरता
दिल बैठता है
गाँव वालों का
सहमी-सहमी -सी
रहती  बहना
 भाग्यशाली  तो हूँ मैं
जो भेज  पातीं हूँ राखी ।
पर क्या समझाऊँ
उन बहनों को
जिनके भाई
बेवजह भेंट चढ़ गए
दुश्मनों के
और कुछ ने तो ली
जल –समाधि
गहरे - नीले सागर में !
!













बिन बुलाये बादल क्यों आते हैं

    बिन बुलाये बादल
क्यों आते हैं
बिन बुलाये
इतने बादल ?
नहीं है अब
संदेश भेजना
मुझे किसी कों ।
देखा था तो तुमने
छतरी लेकर
वह आयीं थी...
कहने को कुछ...
पलकें   झुकी रहीं
मन की परतें
नहीं खुलीं
मौन खड़ा हो गया
बीच मेँ आकर ...
ऐसे में तुम
क्या सदेशा ले जाओगे ?
उन पलकों में क्या
झांक पाओगे ?
वेदना के
गहरे नीले
सागर का बोझ
क्या उठा पाओगे ?
नहीं –नहीं
कोई  ठिकाना नहीं तुम्हारा
न जाने कहाँ
बरस पड़ोगे !


आत्मकथ्य

आत्मकथ्य

 

 [प्रारम्भ में छात्र –जीवन में\,\(1960)के दशक में \,कहानियाँ लिखा करता था।।जो समकालीन पत्रिकाओं में ,यथा,कहानी\, युगचेतना,धर्मयुग, आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं थीं। सम्पूर्ण
प्रकाशित तथा अप्रकाशित  रचनाएँ पटना में आई बाढ़ की भेंट चढ़ गईं । बची-खुची
और प्रकाशित रचनाओं का एक संग्रह जे एन यू में जब था तो हमारे हिन्दी विभाग के एक
प्राध्यापक के मित्र जो राजस्थान् के किसी कॉलेज में पढ़ाते थे ,प्रकाशित करने के उदेश्य से ले गए-।
यह सत्तर के दशक की बात है । फिर अनेक कोशिशों के बावजूद उनका पता नहीं चला । फिर
मैं तकनीक लेखन में लगा रहा ...जीवन की शाम जब ढलने को आई...तो बच्चों के
लिए ...कुछ लिखने का  साधन लैपटाप को बनाया है...}

संक्षिप्त परिचय



जन्म-पटना (बिहार) / शिक्षा –एम  ए, एम लिब आईएससी,पी एच डी (जे एन यू)
कार्य-क्षेत्र –डेप्युटी लायब्रेरियन जे एन यू ।यूनिवरसिटि लायब्रेरियन- आसाम एवं
मिजोरम विश्वविद्यालय –
 लेखन- प्रारम्भ में– कथा-कहानियाँ । फिर ग्रंथालय-विज्ञान में –
अवकाश प्राप्ति के पश्चात पी एच डी निर्देशन...

और अब कुछ माह से कुछ अभिव्यक्त करने की जिज्ञासा...

पंडित जी का इंतज़ार..

पंडित जी का इंतज़ार...

सावन की पूर्णिमा
राखी का दिन
सत्यनारायण  भगवान की कथा
आयोजित किया गया था
पंडित जी अक्सर आया करते थे
उनसे तिथि निश्चित
पहले हो चुकी थी ।

काम वाली को बता दिया गया
कल जल्दी आना
अड़ोस-पड़ोस को कहना होगा
केला के पत्ते
आम का पल्लव
दूब-गोबर
आम की लकड़ी
जुगार करनी होगी
और हिदायत मिली मुझे
लैपटाप नहीं खुलेगा
केला-सेव-बूंदिया
रोली-धूप- अगरबत्ती-और
हवन-सामग्री
का पहले इंतजाम करना होगा ।
शहद घर में है

दही लाना होगा
लिस्ट बना कर जाना
नारियल और गुड
मत भूलना ।
ऐसा ही होगा-
मैंने कहा ।
आस-पड़ोस में खबर हो गयी
तीन बजे पंडित जी आएंगे
कथा होगी...
कुछ पड़ोसन समय पर आयीं
हाथ बटाने
तैयारी पूरी हो गयी
गप-शप भी खत्म हो गया
देर हो गयी
बैठे बैठे ऊब गईं
तो फिर चाय अनिवार्य हो गयी ।
.पर पंडित जी नहीं आए...

दूसरा जत्था देर  से पहुंचा
अनुमान लगाया...
अंतिम अध्याय वांच रहे हींगे
ज्यादा बैठना नहीं पड़ेगा
जल्दी प्रसाद पाकर
लौट आने का अवसर मिलेगा
अंदाजा गलत हुआ
कथा शुरू नहीं हुई
देर तक बैठना पड़ा
चाय-नास्ता भी हो गया
पर पंडित जी नहीं आए
चिंता गहरा गयी
पंडित जी ऐसे तो नहीं थे
पता लगाओ
क्या हो गया ?
हड़बड़ में छाता भुला
बारिस में ही निकाल पड़ा
मालूम था घर में होंगे नहीं
फिर भी चाल तेज कर दी मैने ।
जो सोचा था, वही हुआ ।
दीपक तो जल रहा था
जो आए  जा चुके थे
शाम से रात हो गयी
पर पंडित जी नहीं आए

जब सोने का समय हुआ
पंडित जी का फोन आया
भेद तब खुला
मैंने आज के लिए नहीं
कल के लिए कहा था ।
अब कहने को
बचा ही क्या था ? 
सोचा मैंने
घोटाले के इस देश में
एक दिन का
यहाँ भी  घपला  ।