शनिवार, 7 सितंबर 2013

आस ... किनसे ?


  आस  ... किनसे ?



भवसागर है
नैया छोटी
दिशा विपरीत -
हवा तेज है
बिन पतवार
क्या 
किनारा
मिल पाएगा ?

भीषण जंगल
नदी न नाले
साँप-बिच्छुओं का
भय बहुत है
क्या 
कोई कदम की डार
मिल पायेगी ?

नंगे पाँव
तपती रेत है
मिर्ग -मरीचिका 
जगह-जगह
भटकाती है...
थक-हार कर
बैठ गया हूँ
क्या कोई 
सरोवर की आशा

जग पाएगा ?

छल-प्रपंच की 
इस दुनियाँ में
मन पर 
बड़ा 
बोझ पड़ा है
पकड़े हाथ 
अपनों ने छोड़ा
गैरों ने 
गड्ढे खोदे थे
इस रसातल से 
मैं  निकलूँ 
ऐसा विश्वास
क्या 
मिल पाएगा ?














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