गुरुवार, 3 जुलाई 2014

सावन की बारिश पहली है !






सावन की बारिश पहली  है !

सखी आज
मैना न  आयी
अमराई में
कोयल न  कूकी ।
सूरज भी तो
घने बादलों से
बनी रज़ाई में
दुबका था ।
सोयी यादों को
कुरेदने हवा
कहीं से
बहती आई
मीठे दर्द
भार-उभर कर
मरहम –पट्टी
करने आई ।
पड़ने लगी जब
बड़ी-बड़ी बूंदें
पत्तियों की
मुस्कान खिल गयी
उनकी बची –खुची
बूंदों से
झुलसी दुबें भी
नहा रही थीं
प्यासी धरती की
आँचल भिंगी जब
सोंधी महक
बिखर गयी थी ।
नीम तले
झूला डालो अब
सावन की
सखी
बारिश पहली  है ।
(प्रेमकुमार)





शनिवार, 28 जून 2014

मन की जंजीर


मन की जंजीर



दो अक्षर के
मन ने
ढाई अक्षर के
प्रेम से कहा
नहीं चलेगी
तेरी दीवानगी।
नहीं बनेगा
अब कोई ताज ।

न होगा कोई
हीर –रांझा
और न
लैला –मंजनू ।
जकड़ कर
रखूँगा
तुझे
लोहे की कड़ी

जंजीरों से ।
बांध कर
रखूँगा तुझे
सीमेंट की
ऊंची दीवारों से ।
सह नहीं सका
प्रेम
मन की ऐसी
बंदिश ।
लगा सिसकने वह
बह गयी
आँखों से
आंसुओं की
धारा अविरल ...
बह गयी जंजीर
टूट गयी
सीमेंट की
दीवारें ऊंची
बेगवती धारा में
बह गया ।
डूब गया मन
ऐसा उसमें
गोताखोर भी
ढूंढ  न पाये !





बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

प्रेम- पुष्प

प्रेम –दिवस के अवसर पर
प्रस्तुत है एक रचना.. प्रेम- पुष्प.. प्रेमकुमार



प्रेम- पुष्प

तस्वीर होती है
एक  जब
आँखों में,
शब्द गुम
हो जाते हैं,
सांस एक चलती है
ह्रदय दूसरा  
धड़कता है।
समर्पण की इस घड़ी में
प्रेम -पुष्प निकलते हैं ।

डाली पर बैठी
अलग –अलग
जब दो चिड़ियाँ
चहकती है
बात समझ
एक दूसरे की
साथ – साथ
उड़ जाती हैं
स्वीकृति की इस घड़ी में
प्रेम –पुष्प निकलते हैं ।

चाँद चूमने को जब लहरें
अथक प्रयास करती हैं
बार –बार उठ कर भी
बल खाकर गिरती हैं
फिर भी वे
सागर –तट आकर
प्रेम-गीत लिख देती हैं ।


देख घने
बादलों के झुरमुट
मयूर क्यों  थिरकते हैं ?

जेठ की तपती धरती
सावन की बाट
क्यों जोहती है ?

त्याग- समर्पण –प्रतीक्षा के
निर्मल जल में
शाश्वत प्रेम -कमल
खिलते हैं !


सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

मन के पंख

प्रस्तुत है एक रचना.. मन के पंख..प्रेमकुमार




मन के पंख

शूलों से बिधें मन ने
कहा उदास होकर
मुझे
ले चलो कहीं
जगह ऐसी
जहाँ
पंख मेरे
फरफरा सके
हवा लजा गयी हो
लहरें गा रही हो
लोरी
चाँद आधा हो
सितारे दो-चार 
बादल के कुछ
टुकड़े हों
बर्फ की नदी हो
आइसबर्ग इकट्ठे
मेरे पास हो ।

बात उसकी पूरी
हुई नहीं
धमाके
तरह-तरह के
जगह –जगह
होने लगे
वह ऐसे
आघात से
स्वयं फिर दब गया।
पंख उसके ऐसे जले
फरफराने लायक न रहा !





रविवार, 9 फ़रवरी 2014

ओस की बूंदें

ओस की बूंदें

तारों  की छाँव में
बादलों के
 पंख पर 
आयी मैं उतर कर
इस धरा पर ।
लम्बा सफर था
थक गयी थी मैं
संभाला मुझे
छोटी-छोटी
दूबों ने
हरी –हरी
बाहों से
झूले में
झुलाया मुझे
पेडों की न जाने
कितनी पत्तियों ने ।
बिठाया मुझे
गोद में
फूलों की मखमली
पंखुरियों ने ।
प्यासी धरती ने
आँचल में
बसाया मुझे ।

थकावट मिटने को थी
पौ फटने  लगी
किर्णों ने आकर
लगाया गले
और
कहा कुछ
कानों में मेरे ।
बिठाया मुझे   
सुनहली डोली में
  ले गयी  मिलाने
  मुझे किसी से !
मिलूँगी जब उनसे
बताऊँगी कल !





रविवार, 2 फ़रवरी 2014

आराधना. ...

 आराधना. ..



ज्ञान-गुरु
भारत बन जाए
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ भारती !

विवेकशील
प्राणी हों
सत्य-अहिंसा
अनुगामी हों ।
जन –कल्याण
कारी हों ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ भुवनेश्वरी !

स्वर-लहरी हों
अलग-अलग
संदेश एक
निकले ।
सागर –नदी
पर्वत –जंगल से
रूप-रंग
और बोली से
बंटे हैं इंसान
यदि
पर दिल एक
निकले ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ वागीश्वरी!

चन्द्रकिरण से
धुले मन
सबका
प्रेम –कमल खिले
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ चंद्रकांति !

सन्मति ऐसी
दे दे
मानव को ।
कर दें
जगमग
इस धरती को
विज्ञान के
दुर्लभ प्रकाश से ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ बुद्धिदात्री !

जीवन –संबंध


ऐसा बन जाए 


सब ही
अपने बन जाएँ
नीलकंठ हों
अमृत बांटे
जग ऐसा
तू रच दे
अभिलाषा है यह
मेरी
हे! वरदायिनी !

भय –संशय
तू मिटा दे
ह्रदय सबका
ममता से
भर दे
करुणामय संसार
बसा दे
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ शारदे !

शोषण के अस्त्र
न हों
अहं के वस्त्र
न हों
आस्था हो
मानव –धर्म में
बेल लगा दे
विद्या की ऐसी
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ सरस्वती !

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

आप’ की राह पर...

प्रस्तुत है एक रचना : आप की राह पर... प्रेमकुमार


आप की राह पर



आप की राह पर
हम भी चलेंगे ।

लाल बत्ती छोड़
गाड़ी में चलेंगे ।

मेट्रो नहीं तो क्या
साइकिल में चलेंगे ।

बोतल भर- भर पानी
घर-घर भेजेंगे ।

राहत सहित बिजली
लालटेन भी बाटेंगे।

लेंगे नहीं सुरक्षा
एकला चलेंगे ।

मशाल लेकर हाथ में
भ्रष्टाचार ढ़ूढेंगे ।

सारे मुद्दे भूल कर
जनता को देखेंगे ।

फिर भी आप बढ़े आगे
सब मिल  टांग खींचेंगे ।


03/01/2014/
pkjayaswal11@gmail.com