सावन की बारिश पहली है
!
सखी आज
मैना न आयी
अमराई में
कोयल न कूकी ।
सूरज भी तो
घने बादलों से
बनी रज़ाई में
दुबका था ।
सोयी यादों को
कुरेदने हवा
कहीं से
बहती आई
मीठे दर्द
उभार-उभर कर
मरहम –पट्टी
करने आई ।
पड़ने लगी जब
बड़ी-बड़ी बूंदें
पत्तियों की
मुस्कान खिल गयी
उनकी बची –खुची
बूंदों से
झुलसी दुबें भी
नहा रही थीं
प्यासी धरती की
आँचल भिंगी जब
सोंधी महक
बिखर गयी थी ।
नीम तले
झूला डालो अब
सावन की
सखी
बारिश पहली है ।
(प्रेमकुमार)

.jpg)
