शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

पंडित जी का इंतज़ार..

पंडित जी का इंतज़ार...

सावन की पूर्णिमा
राखी का दिन
सत्यनारायण  भगवान की कथा
आयोजित किया गया था
पंडित जी अक्सर आया करते थे
उनसे तिथि निश्चित
पहले हो चुकी थी ।

काम वाली को बता दिया गया
कल जल्दी आना
अड़ोस-पड़ोस को कहना होगा
केला के पत्ते
आम का पल्लव
दूब-गोबर
आम की लकड़ी
जुगार करनी होगी
और हिदायत मिली मुझे
लैपटाप नहीं खुलेगा
केला-सेव-बूंदिया
रोली-धूप- अगरबत्ती-और
हवन-सामग्री
का पहले इंतजाम करना होगा ।
शहद घर में है

दही लाना होगा
लिस्ट बना कर जाना
नारियल और गुड
मत भूलना ।
ऐसा ही होगा-
मैंने कहा ।
आस-पड़ोस में खबर हो गयी
तीन बजे पंडित जी आएंगे
कथा होगी...
कुछ पड़ोसन समय पर आयीं
हाथ बटाने
तैयारी पूरी हो गयी
गप-शप भी खत्म हो गया
देर हो गयी
बैठे बैठे ऊब गईं
तो फिर चाय अनिवार्य हो गयी ।
.पर पंडित जी नहीं आए...

दूसरा जत्था देर  से पहुंचा
अनुमान लगाया...
अंतिम अध्याय वांच रहे हींगे
ज्यादा बैठना नहीं पड़ेगा
जल्दी प्रसाद पाकर
लौट आने का अवसर मिलेगा
अंदाजा गलत हुआ
कथा शुरू नहीं हुई
देर तक बैठना पड़ा
चाय-नास्ता भी हो गया
पर पंडित जी नहीं आए
चिंता गहरा गयी
पंडित जी ऐसे तो नहीं थे
पता लगाओ
क्या हो गया ?
हड़बड़ में छाता भुला
बारिस में ही निकाल पड़ा
मालूम था घर में होंगे नहीं
फिर भी चाल तेज कर दी मैने ।
जो सोचा था, वही हुआ ।
दीपक तो जल रहा था
जो आए  जा चुके थे
शाम से रात हो गयी
पर पंडित जी नहीं आए

जब सोने का समय हुआ
पंडित जी का फोन आया
भेद तब खुला
मैंने आज के लिए नहीं
कल के लिए कहा था ।
अब कहने को
बचा ही क्या था ? 
सोचा मैंने
घोटाले के इस देश में
एक दिन का
यहाँ भी  घपला  ।


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