शनिवार, 28 जून 2014

मन की जंजीर


मन की जंजीर



दो अक्षर के
मन ने
ढाई अक्षर के
प्रेम से कहा
नहीं चलेगी
तेरी दीवानगी।
नहीं बनेगा
अब कोई ताज ।

न होगा कोई
हीर –रांझा
और न
लैला –मंजनू ।
जकड़ कर
रखूँगा
तुझे
लोहे की कड़ी

जंजीरों से ।
बांध कर
रखूँगा तुझे
सीमेंट की
ऊंची दीवारों से ।
सह नहीं सका
प्रेम
मन की ऐसी
बंदिश ।
लगा सिसकने वह
बह गयी
आँखों से
आंसुओं की
धारा अविरल ...
बह गयी जंजीर
टूट गयी
सीमेंट की
दीवारें ऊंची
बेगवती धारा में
बह गया ।
डूब गया मन
ऐसा उसमें
गोताखोर भी
ढूंढ  न पाये !