बुधवार, 4 सितंबर 2013

विनती


विनती


सीता के तुम
राम
व्यथा सुनो
हमारी।
अहल्या के तारण हार
संभालो
पतवार हमारी।
राधा के तुम
श्याम
वेदना हरो
हमारी।
यशोदा के तुम
लाल
रख लो मान
हमारी।


दुख के बादल
भीषण बरसे
उठाओ
गोवर्धन अब
गिरधारी ।

मन के
इस कोलाहल में
अपनी तान
छेड़ो कनहाई।

अंधकार में
डूबे जन-जन की
ले लो सुधि
बाँके-बिहारी

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