सोमवार, 30 सितंबर 2013

कितना प्यार परिंदों में है...Birds Loving Each Other

कितना प्यार परिंदों में है...




खिड़की पर
लगी थी
एसी।
बैठते थे
दो कबूतर
उस पर
दिन भर।
धूप वहाँ
नहीं आती थी।
बारिश का
खतरा भी
न था ।
बीनी –चुनी
उनकी चीजों के
बिखरने का
नहीं था
अंदेशा
कोने में
लगा था
एसी
आँधी बेअसर
हो जाती थी ।
आश्वासन के
इस माहौल में
गुप-चुप
गुप-चुप
चोंच सटा कर
चुंबन का
इजहार
करते थे ।
नहीं मचाते थे
शोर
बीच में पंख
फरफरा लेते थे
और बीच में
मौन –भाव से
दाना अपना
चुग लेते थे ।

साथ उनका
बंध गया था
ऐसा
जैसे जीवन
का हिस्सा हो।
पर जब कभी
खिड़की से झाँकता
मन भिन्नाता
देख कर
गंदगी इनकी।
साफ कराने के
ख्याल से
छा जाता
आँखों के सामने
उनका मासूम
प्यार-नजारा।

सुबह-सुबह
दूध लाने
जब निकला
नीचे पुलिस
खड़ी थी।
अलग ले जाकर
बताया गार्ड ने
नयी- नयी
शादी है उनकी
जो रहते हैं
इस फ्लॅट में ।
पहले तो
सब
ठीक -ठाक था
अब इधर
भनक पड़ी थी
चीखने- चिल्लाने की।
अलग-अलग
जाने लगे
थे दफ्तर।
ज्यादा कुछ
मालूम नहीं है।
दो दिन पहले
कुछ अधिक
हो गया था
कहा-सुनी ।
साहब यहाँ
हैं नहीं
मैडम की
लाश मिली है ...










शनिवार, 28 सितंबर 2013

जीवंत हैं इन साँसों में जो...

जीवंत हैं इन साँसों में जो



मिल गए जो पञ्चतत्व में
पार क्षितिज के चले गए हैं।
बादल बन छा गए हैं वो 
चाँद-सितारों में समा गए हैं ।
भार बहुत है उनके ऋण का
जीवन के हर डगर-डगर पर ।
पर विवशता की हर घड़ी में


आहट कौन देगा अब मुझको?
अनमोल हैं वे सपने मेरे
  सँजो कर जिसने रखे थे ।
जीवंत हैं इन साँसों में जो
जीवन-दान यही है उनका ।
नीर बहे मिल गए धरा पर
ये पुष्प कहाँ समर्पित होंगे ?

 ऋण है जिनका इस जीवन पर... यह रचना समर्पित है उनको ...प्रेमकुमार

दर्द

दर्द







तिनके- तिनके
जोड़-जोड़ कर
बना लिया था
उसने घोंसला
अपना ।
सूरज उगने से
पहले ही
अपने चोंच से
चुगा देती थी
दाना अपने
नन्हें-मुन्ने को
जो बटोर कर
लाती थी
सबकी
आँख बचा कर
इधर-उधर से।

एक- एक लय
को
चुन –चुन  कर
नदी किनारे से
वह लाती
और उसे
गीतों में
ढाल कर
नन्हें-मुन्ने
को सुनाती।
थप-थपा कर
जब वे सो जाते
निकल आती वह
चुपके –से
और उसी पेड़ की
किसी डाली पर
करती रहती
रखवाली ।
लगे जब वे
पंख फरफराने,
रहे नहीं तब
नन्हें-मुन्ने
ठौर-ठिकाना
जहां मिल गया
लगे बनाने
घोंसला अपना-अपना।
नहीं समझ सकी वह
यह अचानक
क्या हो गया ?
खो गया था
संगीत उसका
और दाने
हो गए थे खोखले
उदासी के
इस आलम में
भटक गयी थी
राह अपनी वह ।
गुजर रही थी
मैदान से
किसी गाँव के
तभी तेज
माँझे- धागे  से
पंख एक जख्मी
हो गया था ।
दर्द समेटे
किसी तरह
जब वह लौटी
घोसलें में
सन्नाटा था
घिर रहा था
अंधेरा।

सुबह हुई जब
निकले
फुर्रफूर्राकर सभी
अपने –अपने
घोंसलों से
उड़ने की
बन गयी कतारें
न कोई झाँका
न कोई ताका
उसके घोंसले में
जहां नहीं थी
कोई आहाट
आँखें दो सिर्फ
दिख  रही थी ...


बुधवार, 25 सितंबर 2013

टपके आँसू ... देश-परदेश में

टपके आँसू ... देश-परदेश में

आसमान में



उड़ रहे थे  
काले-काले 
गुब्बारे ।

और
धरती पर  
दहशत  
फैली थी।

छितरे   थे
चप्पल- चश्मे
अधजली कारें
झुलसे चेहरे
कार की
लावारिस चाभी। 
सर कहीं
और पैर
कहीं थे ।
बाहें दूर
छिटक गईं थी।
धरों के आकार
 कई थे
रंग भरे थे
कपड़ों  पर
 एक जैसे-ही
चीखने-चिल्लाने
और 
रोने की आवाज 
एक जैसी- थी।

ऐसे में
किसकी जुबान ?
किस कौम का ?
रंग और धर्म 
ढूंढना
बेमानी  ही था ।

किस मकसद से
मानवता के
इस संगम को
दफनाने का
अभ्यास किया था ?
जहन में यही था।

तड़के ही जब
लगे निकलने
लाल-लाल
गुब्बारे

बड़े फक्र से
मौत का खेल 
दिखाने वाले
मदारी की
एक जमात ने
इस  
विनाश –लीला की
जिम्मेवारी ले ली 
lटपके आँसू ... देश-परदेश में...
और
लोगों में
छायी थी खामोशी... 
आक्रोश और सपने
नहीं हूए थे
ठंढे ...

जली मोमबत्तियाँ...
टपके आँसू
देश –परदेश में।













सोमवार, 23 सितंबर 2013

आँखों में सफर छोटा-सा



आँखों में सफर छोटा-सा


बिल्कुल सामने

मेरे वह
बैठी थी।
बरबस गयी निगाहें
मेरी
उसकी पूरी
खुली बाहों पर
 और


  
जाकर
चिपक गयी थी ।

ऐसा लगा कि

किसी प्रतिमा 
के लिए 
अलग-  अलग
गढ़ी गयी
दो बाहों को
जोड़ दिया है
किसी ने
आकर
या फिर 
जिम में जाकर
इन्हें खूब
तराशा
गया है ।

आँखों की

काली पुतली को
कोने में
रख कर
जब उसने
देखा सामने मुझको
तितली की भांति
उड़ी निगाहें मेरी
जो चिपकी थी
उसकी बाहों से
और
समा गयी तब
उसकी आँखों के
मटमैले-सफ़ेद 
बादलों में ।
झपकी लेने 
लगी जब
उसकी अलसायी
आँखों ने।
कैद हो गयी
तब मेरी निगाहें
उसके दो इन 
भवरों में।

जब कोई 

स्टेशन आता
आधी खुलती
उसकी आखें    .  
पर  न निकली 
निगाहें मेरी
उसकी अधखुली
आँखों से ।
सो गयी थी
गहरे नींद से 
बड़ा सुकून
मिला था उसको ।
झटके से 
जब ट्रेन रुकी
निगाहें नहीं
समेट पाया अपनी
वह कहीं
उतर चुकी थी!

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

फर्क

(29)

फर्क

भीड़ नहीं थी
बस में ज्यादा
पर गर्मी थी
बेसक ...
खाली थी
सीट पीछे की
पर गुथे थे लोग
महिला –सीट के
आगे-पीछे ।
जब मैं उतरा
भेद खुल गया
हर-तरफ
पसीने की
मिली-जुली
अजीब बू थी

और
महिला सीट के
आस- पास
अनवरत
खुसबू थी ।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

सेवा- भाव

सेवा- भाव 






घने बाल
बालों की जटें
आंचल चिथरे
पावों से बड़ी 
पुरानी चप्पल
आँखों से बह
रहे थे आँसू
पीट रही थी 
अपनी छाती
एकलौते बेटे की
लाश उठाने
अस्पताल से
मांग रही थी 
पैसे
पति गुजर गया था
इसी अस्पताल में
एक्सीडेंट से।
बाइक रोकी
रुका क्षण भर
रहा नहीं गया मुझसे
दे दिये मैंने 
कुछ पैसे ।

शाम हुई जब 
ऑफिस से लौटा
देखा फिर 
वही नजारा ।
लगता है अब
धर्म-कर्म मेँ
लोगों का 
विश्वास उठ गया
नहीं जूटा पायी
वह अब तक
लाश उठाने के 
पैसे 
अस्पताल से ।
इत्फाक से
मिले थे
कुछ पैसे 
मेरे क्लाईंट से
दे दिये मैंने 
द्रवित होकर।
अहसास हुआ
मन में
एक अजीब 
शांति का।

कुछ ही दूर
बढ़ा होगा कि
बाइक ने 
धोखा दे दिया
निकट ही था
उसका अस्पताल
एक गाछ के 
नीचे...
बाइक बन गयी
पर पैसे कुछ
कम क्यों हो गए
यह बताया 
जब मैंने उसको..
पैसे क्यों कम हो गए ?
सर पर उसने
हाथ रख लिए
और सुनाया...
दस के पहले
जब सड़क
सोने को होती है
आती है एक 
चार्टेड बस
और सवार 
होते हैं उसमें
लंगरे लूले
नंगे बच्चे
कोढ़-ग्रसित
कटे जांघ वाले
लिए बैसाखी
गर्भवती दिखती
औरतें
गंदे लिवास  में
और छोटी –छोटी 
लड़कियों के हाथ में
होता है पुलिंदा 
इवनिंग न्यूज़ का।
  
फिर पौ फटते ही
यमुना पार से
आती है 
यही बस चार्टेड
और उतर कर
लग जाते हैं
सब 
अपने धंधे में ।
कहते हैं
ये ठेका है जिसका
पार्टी का वह 
वोट –बैंक है
गरीबी-उन्मूलण प्रोग्राम
का सक्रिय –संयोजक है।




  


देश की पुकार यही है






देश की पुकार यही है



देश की पुकार यही है
जन जन की हुंकार यही है
हर माँ की दुआ यही  है
           थाम लेना यह पतवार हमारा.
जन्म- दिन  का 
यही उपहार तुम्हारा ।
बहे पसीना जिसका खेत में
उसको रोटी जरूर देना
रोटी देना ...
रोटी के सपने मत देना
           गरीबी का अहसास मिटाना
           शस्य- श्यामला तब खुश होगी           
           गर्व से सर  होगा ऊंचा  
जन्म- दिन  का
यही उपहार तुम्हारा ।

          आंचल हो रहा मेरा छोटा
          खो रहीं मेरी  
          हिमगिरि  की श्रंखला
          मोड़ रहा क्यों 
          मेरी नदी की धारा
          रह- रह कर कोई 
          मेरे पैर खींच रहा
          दिल मसोस कर 
          रह जाते हैं सैनिक मेरे ।
          होगी कसीदा इस फटे आँचल की
          यही विश्वास  
          है उपहार तुम्हारा ।





           ।


           

सोमवार, 16 सितंबर 2013

खुसबू



खुसबू

पता नहीं क्यों
एक खास परफूयम
की खुसबू से
आ जाती है
वह... और
उसकी सफ़ेद साडी 
चहकती आँखें
अँग्रेजी –मिश्रित हिन्दी में
कभी न खत्म
होने वाले 
प्यार का 
हर-बार 
एक इजहार
करती है
पूरे विश्वास के साथ ।

आज अचानक
डिब्बे में घुसते ही
ट्रेन के...
छा गयी थी 
वही चिर-परिचित
खुसबू

उभर गया था
यह  चित्र..
क्या होगी 
वह अकेली ...?
या फिर...?
कैसे होगा शुरू
बातों का सिलसिला
या फिर
बना लिया होगा
एक टापू 
अपने दिल में
और दफन कर
दिया होगा 
मिट्टी भर कर...
उस विश्वास को...

फिर भी किया 
मैंने पीछा
उस खुसबू का...

इस छोटी-सी
यात्रा में भी
दिखला गयी 
झलक एक नवयौवना
उसमें भी
अर्ध प्रतिशत
दिख गयी  थी वह ।
पैर मेरे  पर थमे नहीं
रुके वहीं
जहां बेचैन
कर रही खुसबू...
नीले पर्दे के पीछे 
जिस लिवास से
आ रही थी...खुसबू 
वह चोला 
सन्यासी का था
संग जिसके थी
सफ़ेद वस्त्रों में सुसज्जित
कन्या-कुमारी...

और घेरे थे
कुछ लोग
जो आए थे
विदा देने
सन्यासी 
और साध्वी को।

भस्म हो गयी 
कल्पना मेरी !










शनिवार, 14 सितंबर 2013

ले लो ये वसन्त सुनहले

ले लो  ये वसन्त सुनहले


ले लो ये वसन्त सुनहले
पीले पतझड़ 
मुझे दे दो ।
रख लो धुली चाँदनी तुम
रात काली 
मुझे दे दो । 

कभी-कभार  
साये से निकले
कंचनजंघा के       
ये इन्द्रधनुष  
तुम रख लो 
दे दो मुझे ये
बर्फ के गुम्बज
छितरे हैं
जो इधर-उधर ।

द्वार  खोले हैं
आएँगी वे 
सुबह की किरणे
बेताबी से
समेट लेना तुम 
अपनी बाहों में 
और बिताए उन
लम्हों को
संभला देना
मेरी मुट्ठी में ।

तुम्हारे लिए
जो फूल खिलाये
अपनी चाहत की
डाली में 
अपना लेना -
मत लौटना -
सींचे हैं उस पौधे को



भागरथी के जल से ।
पर सहेज कर रखना 
झड़ी –सूखी
पंखुड़ियों को
आऊँगा उसे मैं लेने ...
यदि तुम्हें
याद रहा तो ?








गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अँधेरों में कितने बहे हैं ये आँसू...

अँधेरों में कितने बहे हैं ये आँसू...


रातों में कितने 
बहे हैं ये आँसू
जगे जो सोये तो 
जगाऊँ मैं कैसे ?
सजाये अँधेरों में
कितने ये दीपक 
हवा बन बुझाओ


जलेंगे ये कैसे ?
निहोरे किए तो
चाँदनी आयी है
बादल बनोगी
छिटकेंगी ये कैसे  ? 




तितली में सपनों के
रंग   रह गए गीले
फुहारे बनोगी तो
सूखेंगे कैसे ? 

छाँटे हैं सीपों से
ये  सफ़ेद मोती
बिखेरोगी लहरों में
ढूंढूंगा कैसे ?
चुने फूल नीले
पसंद के तुम्हारी
गुलदस्ते में  लगा लो
मेरी यादों के ।

कोने से मन के
उगा राग तन्हा
न समेटो इसे
तुम अपनी धुनों में
बैसाखी बनेगी 
क्षितिज के सफर का।