भीड़- महिमा
कलश –स्थापन
प्रतिमा-विसर्जन
जन्म-दिवस
पुण्य-तिथि
सफल होते हैं
आयोजन सभी
तुम्हीं से ।
मंदिर-मस्जिद में
चर्च -गुरुद्वारे में
मठ और केंद्र मे
संतों की सभा में
आते हैं
काले धन
तुम्हीं से ।
पानी के लिए
अनशन
पानी में हो अनशन
पटरी उखाड़नी हो
डिब्बे जलाने हो
बिजली का बिल हो
भूमि अधिग्रहण हो
मुआवजे की मांग हो
गल्ले का भाव हो
झंडे उठाने हों
झंडे गाड़ने हों
डंडे खाने हों
जेल भरने हों...
एकमात्र सहारा
तुम्हीं बनती हो ।
सत्ता- पक्ष की
संगनी हो
विपक्ष की
सहेली हो
शक्ति –प्रदशन में
ट्रक- और ट्रेनों में
ठूंस-ठूंस आती हो
बिना भेद-भाव के
दोनों का साथ
देती हो ।
प्रजातन्त्र की जड़ हो
खुद ही एक तंत्र हो
सत्ता उखाड़नी हो
सत्ता बदलनी हो
सड़क से संसद तक
तुम्हीं तो
ले जाती हो
आपदा- विपदा हो ...
धरती डोली हो
बादल फटा हो
बांध टूटा हो
बाढ़ आई हो
मदद के लिए
पहले तुम्हीं आती हो...
गहराई नींद में
सोयी शासन-तंत्र को
भैरवी सुना कर
तुम्हीं जगाती हो ...
शहीद की विधवा के
अनवरत आसुओं को
तुम्हीं पोंछतीं हो...
अस्मत लूटी
बहनों की चिता
तुम्हीं सजाती हो...
यादों में उनकी
जगह- जगह
मोमबत्तियाँ
तुम्हीं जलाती हो ...
बहुरूपा हो ...बहुरंगी हो
कहाँ से आती हो
कहाँ विलुप्त होती हो
न समझ सके हैं ज्ञानी !
समाजशास्त्री हों या मनोवैज्ञानी ?
फिर मेरी क्या बिसात ?
करता हूँ केवल
स्तुति तुम्हारी ।
.jpg)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें