इन जुगनू में ?
खो गये हैं
मेरे कुछ अक्षर ...
खो गये हैं
मेरे कुछ अक्षर
हो गए शब्द
अटपटे निरथक
क्या तुम उनके
अर्थ सजा
पाओगी ?
भींगी पलकों से
छुप- छुपाकर
दो बूंदे
अब टपकेंगी...
क्या तुम
इनको
अपने
आँचल में
लोक पाओगी ?
यादों की मेरी
इन काली
बदली को
क्या बिन बरसाए
अपनी बाहों में
समेट पाओगी?
इंतजार में सूखी
इन गुलाब की
पंखुड़ियों को
क्या तुम
सहेज पाओगी ?
मन के मेरे
अन्तहीन
क्षीतिज को
क्या कोई
आकाश नया
दे पाओगी ?
नहीं कहा कुछ ...!
... आशा के सब
तार टूट गये
निकल पड़ा
बिन पगडंडी के ...
राह चलते
शाम ढली जब
बिजली –सी कौंधी
मेरे मन में
क्या नहीं
मिलोगी
इन जुगनू में ?


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