गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

जीवन-संदेश

जीवन-संदेश


फूल और कांटे है जीवन में
कर्म –अधीन है जीवन सारा ।
मिलता नहीं फल सर्वदा कर्म का ।
नहीं कहो यह विडम्बना है नियति का ।
नियति तो पथ पर बढ़ना है ।
देखते जाओ सपने फूलों  के
काँटों को उखाड फेकना है ।
निराशा की जब बदली छाए
इंद्र-धनुष उसमें ढूंढो तुम ।
डगमगाये जब जीवन –नौका
हिम्मत की पतवार संभालो ।
दायित्व  के जो बोझ उठाते
पथ पर पुष्प बरसते हैं उनके ।
जीवन-संदेश यही हमारा ।




कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को ?

कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को ?

कोख में पलती बिटिया को

जीवन मुक्त कर देता है रावण ।                 
छूटी नहीं मेंहदी हाथ की
चिता सजा कर रख लेता है ।
बन कर श्रवण मात-पिता के
बैकुंठ- धाम भिजवा देता है।
फंसा कर चंगुल में जानकी को
ख़ुदकुशी का तोहफा देता है ।
जहर फैला कर भेद-भाव का
घर एक-दूसरे से जलवा देता है ।
बाजार गरम कर अफवाहों का
भगदड़ बन कुचल देता है ।
सभी धर्म के पवित्र कुंड में
बारूद का शोला रखता है ।
कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को
रक्त-बीज –सा पैदा होता है ।
काम-क्रोध-मोह-लोभ का रावण
रूप अनेक संवार रहा है ।
कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को
हम –सब में अब समा गया है ।












बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

गुड़िया का निकाह


गुड़िया का निकाह


साथ गयी थी
अब्बू के
मेला घूमने
फूफी के घर
शहर में ।

देखा जेवर -
चमकदार कपड़े-
खी फूफी ने
सामने उसके
सज-धज कर
दरगाह जाना है
अल्लाह की दुआ
लेनी है –
कहा यह
फूफी ने उससे ।
सोचा उसने
अम्मी से
फूफी अच्छी है !

बहाना था केवल
नमाज का ।
सहमी-सी
उस बेजान को
निकाह कबूल
करवाया उसने ।
बैठा था
काजी के सामने
मालदार जो
सा साल का ।
इर्द-गिर्द
फैली –थी खुसबू
त्र-फूलैल की ।
बिना घुमाए शहर
रुखसत किया
समझा-बुझा कर
अनजान गुड़िया को।
गाँव आकर
दावत की
तैयारी कर ली ।
लगा फटने
माँ का दिल जब
तलाक की
धमकी देकर
श्न का माहौल
बनाया ।
सुना जब
दूसरे  के अब्बू ने -
ऐसी किस्मत
निकली उसकी
सैर करेगी
हवा में।
तैयार हो गया
दूसरा अब्बू
गुड़िया का निकाह
करने को
लिया पता
उसकी फूफी का ।












सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

मंदोदरी –विलाप: नहीं मारा था राम ने तुमको !

मंदोदरी –विलाप: नहीं मारा था राम ने तुमको !

कर रही थी विलाप
मंदोदरी
कटे सिर लिए
गोद में
रावण के ।
रण-भूमि
लहू-लहान थी
शवों के ढेर से ।

तीन –लोक
जिसने जीता हो ?
ग्रह-गोचर
वश में हो जिसके ?
धन-कुबेर
बा जोहते हों।
हाथ जोड़े
बंदी हो
देवगण ।
काल करे
पहरेदारी जिसकी ।
वेद-शास्त्रों के
पारंगत ।
अस्त्र-शस्त्र-सिद्ध
भुज-बल हों ।
ज्योतिष-शास्त्र के
प्रकांड पंडित को
क्या नहीं ज्ञात हुआ
काल अपना ?
नाथ ! किया था
विनती बहुतेरी ।
सीता नहीं
साधारण नारी ।
राम कोई
पुरुष नहीं हैं ।
नारायण का
रूप धरे हैं ।
धरती-पुत्री सीता
लक्ष्मी का ही स्वरूप है ।
यह सुन कर
ठोकर मारा था-
दुर्बलता है गुण
नारी का -
कह कर यह
अहठ्ठास किया
और दरबार
चले गए ।
तभी
भान हो गया
मुझको-
विनाश –काल
आ गया हमारा ।
अमरत्व के
नाभि-कुंड में
विष
समा गया था
अहंकार का ।
नहीं मारा था
राम ने तुमको ।
अहंकार का
बाण
तुम्हें  लगा था !












रविवार, 13 अक्टूबर 2013

..माँ दुर्गा नवमें स्वरूप में ... माँ सिद्धिधात्री


माँ सिद्धिधात्री  

जगदम्बा
आदि शक्ति ने
की थी कल्पना
सृष्टि रचने की ।
जल ही जल था
उसमें निकला
एक कमल था ।
प्रकट हुए जब
ब्रह्मा जी उससे
भार सौंप दिया
उनको सृष्टि
रचने का।
जग का पालन
करेंगे विष्णु ।
शिव संहार करेंगे
विघ्न-बाधाओं का।
प्रकट हुए
शिव और विष्णु
आदि शक्ति
माँ की इच्छा से ।
माँ  का कार्य
महा-विकट है
जब यह जाना
ब्रह्मा ने
डूब गए वो
गहन –चिंतन में


किया परामर्श
शिव –विष्णु से ।
नर-नारी के अभाव में
होगी कैसे यह सृष्टि ?
उठा यह प्रश्न
उनके मन में ।
गए शरण
वो माँ के।
असमंजस में देख
ब्रहमा को
आदिशक्ति ने
अपने अंश से
किया प्रकट
माँ सिद्धिधात्री को
और व्यक्त की
अपनी इच्छा-
यदि शिव करेंगे
साधना
इस देवी की
सारी सिद्धि
प्राप्त होगी शिव को ।
मार्ग प्रशस्त होगा
सृष्टि – रचना की।

महान साधना
जब शिव ने की
सिद्धि –सारी
प्राप्त हो गयी ।
कर दिया परिवर्तित
शिव के आधे-शरीर को
नारी- रूप में ।
अर्धनारिश्वर बने शिव ।
दिया सहयोग
ब्रह्मा को शिव ने
जगत रचने में।

माँ का रूप है बड़ा मनोहर ।
आसीन हैं कमल-पुष्प पर
चार –भुजाओं में सुसज्जित
गदा –चक्र , शंख –कमल है।
नव –रूपों की अंतिम देवी
नवमें दिन पूजी जाती हैं।
सिद्धि प्राप्त करते जो साधक
बहुजन हिताय की धारणा से
ज्ञान- गगन में करते विचरण
जनमानस आलोकित होता है ।






  















शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

माँ महागौरी .माँ दुर्गा जी की आठवीं शक्ति.

माँ महागौरी


माँ गौरी ने
पूर्व जन्म में
बड़ा कठिन
किया था
पति -रूप में
शिव को पाने का ।
पता नहीं
कितने युग बीते
शरीर सम्पूर्ण
श्यामल
हो गया ।
फिर
मिट्टी और
सूखे पत्तों ने
आच्छादित
कर दिया
अंग सारा ।

लगता था
गढ़ा किसी ने
धूल-धूसरित
गीली मिट्टी से
रूप किसी
मानव –आकार का ।

ढल गए शिव
देख कर
ऐसी घोर तपस्या ।
कैलाशपति ने
अपने हाथों से
साफ किए
पत्ते सारे
और हटाये
परत-दर- परत
ढेर मिट्टी के ।

 धूल गया
अंग एक-एक
माँ का
पवित्र गंगा जल से ।
शिव ने लाया
जिसे ढोकर
स्वयं
गंगा से ।
रूप निखरने लगा
माँ का
बिखरने लगी
स्वर्णिम आभा ।
गौर-वर्ण
हो गईं माँ ।
महागौरी
तब माँ कहलायीं !
नव दुर्गा का
आठवाँ रूप है ।
पूजा होती है
अष्टमी को
शांति और
सादगी की देवी
गौरी माँ की।

जनक -वाटिका में
देखा था -
सीता ने
लता-भवन से निकलते
श्याम –वर्ण
जो  थे ...।
छवि उतरी थी
उनकी
आँखों से
ह्रदय-पटल में
सीता के ।
कहा सखी ने-
जो हैं सांवरे...
वह हैं राम...
संग हैं मुनि
और पीछे
अनुज भ्र्राता हैं ।
माँ गौरी की
पूजा- अर्चना
की थी जानकी ने
मन में बसे
हुए थे राम ...
पूरी हुई थी
मनोकामना
माँ गौरी की
अनुकंपा से ।
पूजतीं आ रही कुमारी
तब से माँ
महागौरी को ।










गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

कालरात्रि माँ …माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति

कालरात्रि माँ माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति

भयभीत हों दानव जैसे
माँ ने वैसा रूप धरा है ।
बाल बिखरे हैं ,
नील वर्ण है ,
आँखों से बाण
निकल रहे हैं ।
अंगारे बरसाती है मुंह से
बहती है नासिकाओं से आँधी
हाथों में कटार कांटा है
कंठ-हार से निकल रही दामिनी
दानव –दल काँप रहे हैं ।
बड़ा विकराल रूप है माँ का।

देवताओं के आवाहण पर
शक्ति का अदभूत रूप
प्रगट हुआ था ।

अमरता का वरदान लिए
रक्तबीज एक दानव था।
एक बूंद रक्त से उसके
पैदा होंगे दानव असंख्य ।
कौन करेगा साहस उसके
संहार का ?
देवताओं के गुहार पर
किया था माँ ने
संहार उसका
नहीं गिरा था धरा पर
एक बूंद भी रक्त का ।
लपलपाती लाल जिह्वा में
लील लिया था
उसके रक्त को।
रक्तबीज माँ का ही
सम्बोधन है।

अज्ञान ही अंधकार है
जिसे दूर करती है माँ ।
होगी जब कठिन साधना
तप- कर ज्ञान निखर जाएगा
मिट जाएगा मन का पिशाच
मन निर्भय हो जाएगा ।








मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

मौसम जैसे बदलती हो तुम …

मौसम जैसे बदलती हो तुम


बदलती हो तुम  वैसे
मौसम जैसे बदलता है ।
जबसँवारती हों केशों को
घटा काली छा जाती है ।
गेंहुए रंग में साड़ी पीली
ऋतु बसंत जैसा लगता है ।
थोड़ी –सी मुस्कान तुम्हारी
शिशिर पंख फैला देता है ।
हो जाती हो जब तुम गुमसुम
हेमंत सिमट कर रह जाता है ।
दमकता है जब चेहरा गुस्से-से
भाग कर ग्रीष्म आ जाता है ।
मनुहारों से भींग जाती है जब नाराजगी

बिना मौसम बरसात होती है ।

बिना कहे जो गुजर गया ...


बिना कहे जो गुजर गया ...


मत करना अफसोस
यदि सहारा
अपना कोई
गुजर गया हो 
खुद सहारा बनना
अपना ।
यही कहा था
कहने को मुझसे
जो बिना कहे
तुमसे
गुजर गया  वह ।

मत करना अफसोस
यदि इस बसंत में
नहीं खिले हैं फूल
तुम्हारे
उस पौधे में
जिसे सींच कर
बड़ा किया था
रात दिन
बड़ी लगन से ।
कर लेना इंतजार
एक और बसत का
यह भी तुमसे
बिना कहे
गुजर गया वह ।

मत करना अफसोस
यदि अहसान तुम्हारे
भुला दिये हों सबने ।
यह तो फितरत है
दुनिया की
इसे भूल
जाना  ही होगा ।
यह भी
बिना कहे तुमसे
गुजर गया वह ।

मत करना अफसोस
यदि  प्रेम तुम्हारा
स्वीकार नहीं किया
किसी ने ।
मजबूरी से
घिरी  होगी वह ।
संवेदना के उसे
स्वर दे कर
सफर तय
करना ही होगा ।
यह भी
बिना कहे तुमसे
गुजर गया वह ।  

हादसों- भरी
इस जीवन में
बेसहारे बहुत मिलेंगे
उम्मीदों की आँखें उनकी
जब टिक जाए
तुम पर
मत करना अफसोस
केवल
बन जाना
सहारा उनका -
यह कहने को
तुमसे-
कह कर
गुजर गए वो ।