रविवार, 8 सितंबर 2013

गणेश जी की वेदना

गणेश जी की वेदना





पहली बार 
जब
आए थे 
बड़े जतन से
तांबे की
छोटी थाली में
धूप-दीप
फल-फूल
सजा कर
पूजा-अर्चना की थी मेरी ।
और श्रद्धा- भरी
आँखों से मुझे 
निहारा
नत-मस्तक हो
दोनों ने
अपने-अपने
हाथ जोड़े थे ।
मेरी स्मृति में
है सुरक्षित ।
अच्छा लगा था
तब मुझे यह
भक्ति-भाव तुम्हारा ।

चौंध गयी है
छोटी-छोटी
मेरी आँखें 
सोने का यह मुकुट 
और 
देख कर 
चाँदी की बड़ी परात में
झांक रहें जो
पीत आवरण से
ढके हुए 
बड़े-बड़े मोदक ।

छुपा नहीं यह
रहस्य तुम्हारा
रुला-रुला कर
डरा-धमका कर
हड़प लिया
माँ-बाप का
जायदाद -सारा । 
और डाल दिया  उन्हें
वानप्रस्थ आश्रम में ।
खूब कमाया
धन विदेश में
और बनवाया है 
यह मुकुट हमारा ।
क्या भूल गया तू...
कार्तिक को 
अभिमान बहुत था 
अपने वाहन का 
निकल पड़ा
परिक्रमा करने 
इस धरती का ।
मेरा वाहन
छोटा सा है
लेकर उसको
कर ली प्रदक्षिणा
सात बार
मात-पिता की
सात-लोक 


जहां मिलते हैं ...
और भर-भरा गईं
उनकी छोटी- छोटी आंखे 
भक्त का यह 
व्यवहार देख कर !


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