सोमवार, 16 सितंबर 2013

खुसबू



खुसबू

पता नहीं क्यों
एक खास परफूयम
की खुसबू से
आ जाती है
वह... और
उसकी सफ़ेद साडी 
चहकती आँखें
अँग्रेजी –मिश्रित हिन्दी में
कभी न खत्म
होने वाले 
प्यार का 
हर-बार 
एक इजहार
करती है
पूरे विश्वास के साथ ।

आज अचानक
डिब्बे में घुसते ही
ट्रेन के...
छा गयी थी 
वही चिर-परिचित
खुसबू

उभर गया था
यह  चित्र..
क्या होगी 
वह अकेली ...?
या फिर...?
कैसे होगा शुरू
बातों का सिलसिला
या फिर
बना लिया होगा
एक टापू 
अपने दिल में
और दफन कर
दिया होगा 
मिट्टी भर कर...
उस विश्वास को...

फिर भी किया 
मैंने पीछा
उस खुसबू का...

इस छोटी-सी
यात्रा में भी
दिखला गयी 
झलक एक नवयौवना
उसमें भी
अर्ध प्रतिशत
दिख गयी  थी वह ।
पैर मेरे  पर थमे नहीं
रुके वहीं
जहां बेचैन
कर रही खुसबू...
नीले पर्दे के पीछे 
जिस लिवास से
आ रही थी...खुसबू 
वह चोला 
सन्यासी का था
संग जिसके थी
सफ़ेद वस्त्रों में सुसज्जित
कन्या-कुमारी...

और घेरे थे
कुछ लोग
जो आए थे
विदा देने
सन्यासी 
और साध्वी को।

भस्म हो गयी 
कल्पना मेरी !










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