सोमवार, 23 सितंबर 2013

आँखों में सफर छोटा-सा



आँखों में सफर छोटा-सा


बिल्कुल सामने

मेरे वह
बैठी थी।
बरबस गयी निगाहें
मेरी
उसकी पूरी
खुली बाहों पर
 और


  
जाकर
चिपक गयी थी ।

ऐसा लगा कि

किसी प्रतिमा 
के लिए 
अलग-  अलग
गढ़ी गयी
दो बाहों को
जोड़ दिया है
किसी ने
आकर
या फिर 
जिम में जाकर
इन्हें खूब
तराशा
गया है ।

आँखों की

काली पुतली को
कोने में
रख कर
जब उसने
देखा सामने मुझको
तितली की भांति
उड़ी निगाहें मेरी
जो चिपकी थी
उसकी बाहों से
और
समा गयी तब
उसकी आँखों के
मटमैले-सफ़ेद 
बादलों में ।
झपकी लेने 
लगी जब
उसकी अलसायी
आँखों ने।
कैद हो गयी
तब मेरी निगाहें
उसके दो इन 
भवरों में।

जब कोई 

स्टेशन आता
आधी खुलती
उसकी आखें    .  
पर  न निकली 
निगाहें मेरी
उसकी अधखुली
आँखों से ।
सो गयी थी
गहरे नींद से 
बड़ा सुकून
मिला था उसको ।
झटके से 
जब ट्रेन रुकी
निगाहें नहीं
समेट पाया अपनी
वह कहीं
उतर चुकी थी!

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