मंगलवार, 17 सितंबर 2013

सेवा- भाव

सेवा- भाव 






घने बाल
बालों की जटें
आंचल चिथरे
पावों से बड़ी 
पुरानी चप्पल
आँखों से बह
रहे थे आँसू
पीट रही थी 
अपनी छाती
एकलौते बेटे की
लाश उठाने
अस्पताल से
मांग रही थी 
पैसे
पति गुजर गया था
इसी अस्पताल में
एक्सीडेंट से।
बाइक रोकी
रुका क्षण भर
रहा नहीं गया मुझसे
दे दिये मैंने 
कुछ पैसे ।

शाम हुई जब 
ऑफिस से लौटा
देखा फिर 
वही नजारा ।
लगता है अब
धर्म-कर्म मेँ
लोगों का 
विश्वास उठ गया
नहीं जूटा पायी
वह अब तक
लाश उठाने के 
पैसे 
अस्पताल से ।
इत्फाक से
मिले थे
कुछ पैसे 
मेरे क्लाईंट से
दे दिये मैंने 
द्रवित होकर।
अहसास हुआ
मन में
एक अजीब 
शांति का।

कुछ ही दूर
बढ़ा होगा कि
बाइक ने 
धोखा दे दिया
निकट ही था
उसका अस्पताल
एक गाछ के 
नीचे...
बाइक बन गयी
पर पैसे कुछ
कम क्यों हो गए
यह बताया 
जब मैंने उसको..
पैसे क्यों कम हो गए ?
सर पर उसने
हाथ रख लिए
और सुनाया...
दस के पहले
जब सड़क
सोने को होती है
आती है एक 
चार्टेड बस
और सवार 
होते हैं उसमें
लंगरे लूले
नंगे बच्चे
कोढ़-ग्रसित
कटे जांघ वाले
लिए बैसाखी
गर्भवती दिखती
औरतें
गंदे लिवास  में
और छोटी –छोटी 
लड़कियों के हाथ में
होता है पुलिंदा 
इवनिंग न्यूज़ का।
  
फिर पौ फटते ही
यमुना पार से
आती है 
यही बस चार्टेड
और उतर कर
लग जाते हैं
सब 
अपने धंधे में ।
कहते हैं
ये ठेका है जिसका
पार्टी का वह 
वोट –बैंक है
गरीबी-उन्मूलण प्रोग्राम
का सक्रिय –संयोजक है।




  


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