दर्द
तिनके-
तिनके
जोड़-जोड़
कर
बना
लिया था
उसने
घोंसला
अपना ।
सूरज
उगने से
पहले
ही
अपने
चोंच से
चुगा
देती थी
दाना
अपने
नन्हें-मुन्ने
को
जो
बटोर कर
लाती
थी
सबकी
आँख
बचा कर
इधर-उधर
से।
एक- एक
लय
को
चुन –चुन कर
नदी
किनारे से
वह
लाती
और उसे
गीतों
में
ढाल कर
नन्हें-मुन्ने
को
सुनाती।
थप-थपा
कर
जब वे
सो जाते
निकल
आती वह
चुपके –से
और उसी
पेड़ की
किसी
डाली पर
करती
रहती
रखवाली
।
लगे जब वे
पंख फरफराने,
रहे
नहीं तब
नन्हें-मुन्ने
ठौर-ठिकाना
जहां
मिल गया
लगे
बनाने
घोंसला
अपना-अपना।
नहीं
समझ सकी वह
यह
अचानक
क्या
हो गया ?
खो गया
था
संगीत
उसका
और
दाने
हो गए
थे खोखले
उदासी
के
इस आलम
में
भटक
गयी थी
राह
अपनी वह ।
गुजर
रही थी
मैदान
से
किसी
गाँव के
तभी
तेज
माँझे- धागे से
पंख एक
जख्मी
हो गया
था ।
दर्द
समेटे
किसी
तरह
जब वह
लौटी
घोसलें
में
सन्नाटा
था
घिर
रहा था
अंधेरा।
सुबह
हुई जब
निकले
फुर्रफूर्राकर
सभी
अपने –अपने
घोंसलों
से
उड़ने
की
बन गयी
कतारें
न कोई
झाँका
न कोई
ताका
उसके
घोंसले में
जहां
नहीं थी
कोई
आहाट
आँखें
दो सिर्फ
दिख रही थी ...


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