शनिवार, 28 सितंबर 2013

दर्द

दर्द







तिनके- तिनके
जोड़-जोड़ कर
बना लिया था
उसने घोंसला
अपना ।
सूरज उगने से
पहले ही
अपने चोंच से
चुगा देती थी
दाना अपने
नन्हें-मुन्ने को
जो बटोर कर
लाती थी
सबकी
आँख बचा कर
इधर-उधर से।

एक- एक लय
को
चुन –चुन  कर
नदी किनारे से
वह लाती
और उसे
गीतों में
ढाल कर
नन्हें-मुन्ने
को सुनाती।
थप-थपा कर
जब वे सो जाते
निकल आती वह
चुपके –से
और उसी पेड़ की
किसी डाली पर
करती रहती
रखवाली ।
लगे जब वे
पंख फरफराने,
रहे नहीं तब
नन्हें-मुन्ने
ठौर-ठिकाना
जहां मिल गया
लगे बनाने
घोंसला अपना-अपना।
नहीं समझ सकी वह
यह अचानक
क्या हो गया ?
खो गया था
संगीत उसका
और दाने
हो गए थे खोखले
उदासी के
इस आलम में
भटक गयी थी
राह अपनी वह ।
गुजर रही थी
मैदान से
किसी गाँव के
तभी तेज
माँझे- धागे  से
पंख एक जख्मी
हो गया था ।
दर्द समेटे
किसी तरह
जब वह लौटी
घोसलें में
सन्नाटा था
घिर रहा था
अंधेरा।

सुबह हुई जब
निकले
फुर्रफूर्राकर सभी
अपने –अपने
घोंसलों से
उड़ने की
बन गयी कतारें
न कोई झाँका
न कोई ताका
उसके घोंसले में
जहां नहीं थी
कोई आहाट
आँखें दो सिर्फ
दिख  रही थी ...


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