शनिवार, 28 सितंबर 2013

जीवंत हैं इन साँसों में जो...

जीवंत हैं इन साँसों में जो



मिल गए जो पञ्चतत्व में
पार क्षितिज के चले गए हैं।
बादल बन छा गए हैं वो 
चाँद-सितारों में समा गए हैं ।
भार बहुत है उनके ऋण का
जीवन के हर डगर-डगर पर ।
पर विवशता की हर घड़ी में


आहट कौन देगा अब मुझको?
अनमोल हैं वे सपने मेरे
  सँजो कर जिसने रखे थे ।
जीवंत हैं इन साँसों में जो
जीवन-दान यही है उनका ।
नीर बहे मिल गए धरा पर
ये पुष्प कहाँ समर्पित होंगे ?

 ऋण है जिनका इस जीवन पर... यह रचना समर्पित है उनको ...प्रेमकुमार

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