विस्मृति
प्रस्तुत है एक रचना..
विस्मृति….प्रेमकुमार
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
घने बालों के साये में ।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
आँखों के पलकों में
।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
साँसों के
प्रवाह में ।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
मुस्कान के घेरे में
।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
दिल के एक कोने में
।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
कदमों की आहट में ।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
गीत के एक बोल में ।
ज़िंदगी एक बीत गयी ,
मन के आँगन में ।
पर तुम कहती हो –
मुझे कुछ याद नहीं ।
यह कैसी विडम्बना है !
मेरी ढेरों - ज़िंदगी का
तुम्हारे पास हिसाब नहीं !






.jpg)