गुरुवार, 12 सितंबर 2013

अँधेरों में कितने बहे हैं ये आँसू...

अँधेरों में कितने बहे हैं ये आँसू...


रातों में कितने 
बहे हैं ये आँसू
जगे जो सोये तो 
जगाऊँ मैं कैसे ?
सजाये अँधेरों में
कितने ये दीपक 
हवा बन बुझाओ


जलेंगे ये कैसे ?
निहोरे किए तो
चाँदनी आयी है
बादल बनोगी
छिटकेंगी ये कैसे  ? 




तितली में सपनों के
रंग   रह गए गीले
फुहारे बनोगी तो
सूखेंगे कैसे ? 

छाँटे हैं सीपों से
ये  सफ़ेद मोती
बिखेरोगी लहरों में
ढूंढूंगा कैसे ?
चुने फूल नीले
पसंद के तुम्हारी
गुलदस्ते में  लगा लो
मेरी यादों के ।

कोने से मन के
उगा राग तन्हा
न समेटो इसे
तुम अपनी धुनों में
बैसाखी बनेगी 
क्षितिज के सफर का।

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