शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

अनकही व्यथा


अनकही व्यथा



फूल खिले
रहे कुछ अधखिले
कुछ खिले नहीं ।

चाँद उगा
ईद का
फिर दूज का
उगा पूरा तब
पुर्णिमा का ।

बादल छाए
हल्के- हल्के
घने –घने\
हल्के-घने –काले
मिल-मिला के ।

हवा आई
बड़े ज़ोर से
फिर बही
मन्द-मन्द
न जाने
कहाँ जाकर 
फिर ठहर गयी ।

बुँदे टपकी
बड़ी-बड़ी
छोटी-छोटी
कहीं वह भी नहीं ।

किरणें निकलीं
सकुचा के
मुस्कुरा के
खिल खिला के ।
... गया बताने
जब मैं उसको
न फूल खिले
न चाँद उगा
न बादल छाए
न हवा बही
न बुँदे टपकीं
उसके दिल में
और किरणें
आकर लौट गईं थी ...
खड़ी रहीं
वह मूर्ति बन कर
संगमर्मर की ।

आँखें सिर्फ क्यों
सजीव हो गयी...?
गीलीं पलकें
खोल गईं थीं
दबी-अनकही
उसकी व्यथा को !


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