शनिवार, 14 सितंबर 2013

ले लो ये वसन्त सुनहले

ले लो  ये वसन्त सुनहले


ले लो ये वसन्त सुनहले
पीले पतझड़ 
मुझे दे दो ।
रख लो धुली चाँदनी तुम
रात काली 
मुझे दे दो । 

कभी-कभार  
साये से निकले
कंचनजंघा के       
ये इन्द्रधनुष  
तुम रख लो 
दे दो मुझे ये
बर्फ के गुम्बज
छितरे हैं
जो इधर-उधर ।

द्वार  खोले हैं
आएँगी वे 
सुबह की किरणे
बेताबी से
समेट लेना तुम 
अपनी बाहों में 
और बिताए उन
लम्हों को
संभला देना
मेरी मुट्ठी में ।

तुम्हारे लिए
जो फूल खिलाये
अपनी चाहत की
डाली में 
अपना लेना -
मत लौटना -
सींचे हैं उस पौधे को



भागरथी के जल से ।
पर सहेज कर रखना 
झड़ी –सूखी
पंखुड़ियों को
आऊँगा उसे मैं लेने ...
यदि तुम्हें
याद रहा तो ?








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