ले लो ये वसन्त सुनहले
ले लो ये वसन्त सुनहले
पीले पतझड़
मुझे दे दो ।
रख लो धुली चाँदनी तुम
रात काली
मुझे दे दो ।
कभी-कभार
साये से निकले
कंचनजंघा के
ये इन्द्रधनुष
तुम रख लो
दे दो मुझे ये
बर्फ के गुम्बज
छितरे हैं
जो इधर-उधर ।
द्वार खोले हैं
आएँगी वे
सुबह की किरणे
बेताबी से
समेट लेना तुम
अपनी बाहों में
और बिताए उन
लम्हों को
संभला देना
मेरी मुट्ठी में ।
तुम्हारे लिए
जो फूल खिलाये
अपनी चाहत की
डाली में
अपना लेना -
मत लौटना -
सींचे हैं उस पौधे को
भागरथी के जल से ।
पर सहेज कर रखना
झड़ी –सूखी
पंखुड़ियों को
आऊँगा उसे मैं लेने ...
यदि तुम्हें
याद रहा तो ?
ले लो ये वसन्त सुनहले
पीले पतझड़
मुझे दे दो ।
रख लो धुली चाँदनी तुम
रात काली
मुझे दे दो ।
कभी-कभार
साये से निकले
कंचनजंघा के
ये इन्द्रधनुष
तुम रख लो
दे दो मुझे ये
बर्फ के गुम्बज
छितरे हैं
जो इधर-उधर ।
द्वार खोले हैं
आएँगी वे
सुबह की किरणे
बेताबी से
समेट लेना तुम
अपनी बाहों में
और बिताए उन
लम्हों को
संभला देना
मेरी मुट्ठी में ।
तुम्हारे लिए
जो फूल खिलाये
अपनी चाहत की
डाली में
अपना लेना -
मत लौटना -
सींचे हैं उस पौधे को
भागरथी के जल से ।
पर सहेज कर रखना
झड़ी –सूखी
पंखुड़ियों को
आऊँगा उसे मैं लेने ...
यदि तुम्हें
याद रहा तो ?
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