बुधवार, 4 सितंबर 2013

तीज...विश्वास अटूट है।



तीज...विश्वास अटूट है।


चार सौ की चूड़ी आती
पन्द्रह सौ की साड़ी
साया तो रेडीमेड
मिल जाती
ब्लाउज़ सिलाई
है महंगी

बची-खुची
सामग्री से
सिंगार हो जाएगी पूरी।
नथिया तो गिरवी
रखा है
मुन्नी की बीमारी में
चार साल बीत गए
 न छुड़ा पाये अब तक ?
भेजे रूपये सब सध गए
मुन्ने के एड्मिशन में ।
सूजी-मैदा-घी और मेवा
कहाँ से लाऊं...?
क्या तुम्हें अंदाज नहीं है?
रूपये तो कम भेज रहे
क्या रख लिया
किसी को ?
भाँप लिया पत्नी का गुस्सा-
पैंचा ले
रूपये पठवाये
और सदेश कहा
मोहन ने –
हे मेरी सगुना भाभी !
कर लो विधि -
तीज की  पूरी...
इस साल में
जैसे-तैसे ।
जहां  काम करते है
हमलोग -
कहते हैं
रुपया लुढ़का है ...
हमलोग तो
नहीं समझे
पर समझ गईं
सुहागिन भाभी ।
रूपये को
बड़ा रोग
लग गया है
कोई
कमजोर हो
लुढ़क पड़ा है
(मेरे साजन में कोई
खोट नहीं है )
\नहीं फिसले
मुन्ना के बाबू
विश्वास अटूट है।






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