रविवार, 1 सितंबर 2013

हैं वे चतुर्भुज

हैं वे चतुर्भुज



हैं वे चतुर्भुज
पर दो हाथ उनके
दिखते नहीं
जादुई हाथ हैं ।
आलमारी में बंद
कानूनी किताबों के
सफे सफेद करते हैं।
लह-लहाते
धान-बाजरे और गेहूं
के खेतों में
रंगीन भवन उगाते हैं।
झुग्गी-झोपड़ियों को
शरण  देकर
ज्ञान-प्रसाद बांटते हैं ।
नदी-नहरों के जल
उलीच कर
तनाव-मुक्त
रिसोर्ट बनाते हैं ।
बस्तियों को
झुलसा क
पुनर्वास करवाते हैं
और रोजी-रोटी के लिए उनकी
कारखाने बैठाते हैं ।
इसी पावन भूमि
पर ये चतुर्भुजी विराजे हैं
और  उनके अद्रश्य
कर-कमलों से
अल्लाह- ईश्वर
अलग होते हैं ।
और  दोनों के
भक्त- गण
अलग- अलग
सजाते हैं
टोपी  और
मालाओं से ।



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