आशियाना
सुकून के लिए
आया
सागर तट पर
बनाया फिर
एक नया आशियाना -
बालुऔं से
बदरंगे घोंघों
और चमकती
छोटी-बड़ी सीपों से ।
डूबती किरणों ने
देखा आशियाना
रंग दिया उसे
अपने रंगों से...
हवा के झोंकों ने
खिड़की बनायी
भर दिया उसे
अपनी यादों से...
टिकटिकी बांध
देख रही थीं लहरे
सँजो दिये उसने
अनवरत
संगीत के फेरे ।
फिर कहाँ जाऊं
उस रक्त- रंजित
शहर में
जहां जल रहें हैं
एक-दूसरे के
आशियाने !

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