मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

ब्रह्मचारिणी माँ- दूसरा रूप है माँ का

ब्रह्मचारिणी माँ- दूसरा रूप है माँ का

 जो हिमालय की पुत्री थी
है वही   माँ ब्रह्मचारिणी


रूप है दूसरा  नव-दुर्गा का
पूजा होती है दूसरे दिन।

नारद ने देखा था हाथ
बचपन में शैलपुत्री का ।
तप ही होगा
जीवन उसका ।
होगी
मनोकामना पूरी ।
पति रूप में शिव मिलेंगे ।
कहा था नारद ने
शैलपुत्री की माँ को ।
दिखने लगे थे लक्षण...
बचपन से ही
जो कहा था
मुनि नारद ने ।
खेल-कूद में,
काम-काज में
मन नहीं
लगता था उसका ।
संग – सहेलियों के बीच
अनमनी-सी रहती थी ।
मुनि ने
मति फेरी थी  
यही माँ
कहा करती थी ।
मां ने
कोसा था बहुत
नारद को ।
पर मुनि - वचन
कब झूठा होगा ?
सालों बीत गए
तप करते ।
तीन हजार वर्ष
जब  हुए पूरे
फलाहार भी  
छोड़ा  दिया था।
बेल पत्तों के
बल पर
कठोर तप
चल रहा था ।
एक हजार वर्ष
और बीत गए।
पत्तों का
संबल भी छोड़ा
कहलाने लगीं
माँ अर्पणा ।
बना शरीर
हड्डी का ढांचा
सांस केवल
चल रही था ।
देवगणों ने
देखा नहीं  था
ऐसा कठोर
तप  किसी का ।
बरसाए सुंमन गगन से
और धरा पर आकर
देवगणों ने
वरदानों की झड़ी लगा दी ।
शक्ति का
यह रूप दूसरा
यहीं  हैं
माँ ब्रह्मचारिणी !
तप- ज्ञान
त्याग – वैराग्य
और सादगी की
देवी हैं
माँ ब्रहमचारिणी।
होगा जीवन
जब विभूषित
इन गुणों से
तब पूजा
स्वीकार करेंगी
उर्जादायिनी माँ
तुम्हारी !

















कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें