सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

मंदोदरी –विलाप: नहीं मारा था राम ने तुमको !

मंदोदरी –विलाप: नहीं मारा था राम ने तुमको !

कर रही थी विलाप
मंदोदरी
कटे सिर लिए
गोद में
रावण के ।
रण-भूमि
लहू-लहान थी
शवों के ढेर से ।

तीन –लोक
जिसने जीता हो ?
ग्रह-गोचर
वश में हो जिसके ?
धन-कुबेर
बा जोहते हों।
हाथ जोड़े
बंदी हो
देवगण ।
काल करे
पहरेदारी जिसकी ।
वेद-शास्त्रों के
पारंगत ।
अस्त्र-शस्त्र-सिद्ध
भुज-बल हों ।
ज्योतिष-शास्त्र के
प्रकांड पंडित को
क्या नहीं ज्ञात हुआ
काल अपना ?
नाथ ! किया था
विनती बहुतेरी ।
सीता नहीं
साधारण नारी ।
राम कोई
पुरुष नहीं हैं ।
नारायण का
रूप धरे हैं ।
धरती-पुत्री सीता
लक्ष्मी का ही स्वरूप है ।
यह सुन कर
ठोकर मारा था-
दुर्बलता है गुण
नारी का -
कह कर यह
अहठ्ठास किया
और दरबार
चले गए ।
तभी
भान हो गया
मुझको-
विनाश –काल
आ गया हमारा ।
अमरत्व के
नाभि-कुंड में
विष
समा गया था
अहंकार का ।
नहीं मारा था
राम ने तुमको ।
अहंकार का
बाण
तुम्हें  लगा था !












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