गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

प्रेमकुमार की यह रचना प्रस्तुत है : बादल का टुकड़ा

बादल का टुकड़ा

गाड़ी के पीछे शीशे से
बादल का टुकड़ा देखा है ।
सूख गयी जो नदी तपन से
राह तकती  बारिश देखा है ।
प्यासी झील की आँचल के
कोने में लाल कमल देखा है ।
शुष्क पर्वत के ह्रदय से
पेड़ हरे उगते देखा है ।
झड़ रहे थे पत्ते जिनके
उन आँखों में कोंपल देखा है .
ममता की सूनी गोदी में
नन्हीं बिटिया का सपना देखा है ।
गीली आँखों से  ही उनकी
गीत सँवरते अपना देखा है ।
कंक्रीट के इस  बियावान में
छिप कर खिले सदाहार देखा है ।
गाड़ी के पीछे शीशे से
बादल का टुकड़ा देखा है ।













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