शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

माँ महागौरी .माँ दुर्गा जी की आठवीं शक्ति.

माँ महागौरी


माँ गौरी ने
पूर्व जन्म में
बड़ा कठिन
किया था
पति -रूप में
शिव को पाने का ।
पता नहीं
कितने युग बीते
शरीर सम्पूर्ण
श्यामल
हो गया ।
फिर
मिट्टी और
सूखे पत्तों ने
आच्छादित
कर दिया
अंग सारा ।

लगता था
गढ़ा किसी ने
धूल-धूसरित
गीली मिट्टी से
रूप किसी
मानव –आकार का ।

ढल गए शिव
देख कर
ऐसी घोर तपस्या ।
कैलाशपति ने
अपने हाथों से
साफ किए
पत्ते सारे
और हटाये
परत-दर- परत
ढेर मिट्टी के ।

 धूल गया
अंग एक-एक
माँ का
पवित्र गंगा जल से ।
शिव ने लाया
जिसे ढोकर
स्वयं
गंगा से ।
रूप निखरने लगा
माँ का
बिखरने लगी
स्वर्णिम आभा ।
गौर-वर्ण
हो गईं माँ ।
महागौरी
तब माँ कहलायीं !
नव दुर्गा का
आठवाँ रूप है ।
पूजा होती है
अष्टमी को
शांति और
सादगी की देवी
गौरी माँ की।

जनक -वाटिका में
देखा था -
सीता ने
लता-भवन से निकलते
श्याम –वर्ण
जो  थे ...।
छवि उतरी थी
उनकी
आँखों से
ह्रदय-पटल में
सीता के ।
कहा सखी ने-
जो हैं सांवरे...
वह हैं राम...
संग हैं मुनि
और पीछे
अनुज भ्र्राता हैं ।
माँ गौरी की
पूजा- अर्चना
की थी जानकी ने
मन में बसे
हुए थे राम ...
पूरी हुई थी
मनोकामना
माँ गौरी की
अनुकंपा से ।
पूजतीं आ रही कुमारी
तब से माँ
महागौरी को ।










कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें