माँ महागौरी
माँ गौरी ने
पूर्व जन्म में
बड़ा कठिन
तप किया था
पति -रूप में
शिव को पाने का ।
पता नहीं
कितने युग बीते
शरीर सम्पूर्ण
श्यामल
हो गया ।
फिर
मिट्टी और
सूखे पत्तों ने
आच्छादित
कर दिया
अंग सारा ।
लगता था
गढ़ा किसी ने
धूल-धूसरित
गीली मिट्टी से
रूप किसी
मानव –आकार का ।
ढल गए शिव
देख कर
ऐसी घोर तपस्या ।
कैलाशपति ने
अपने हाथों से
साफ किए
पत्ते सारे
और हटाये
परत-दर- परत
ढेर मिट्टी के ।
धूल गया
अंग एक-एक
माँ का
पवित्र गंगा जल से ।
शिव ने लाया
जिसे ढोकर
स्वयं
गंगा से ।
रूप निखरने लगा
माँ का
बिखरने लगी
स्वर्णिम आभा ।
गौर-वर्ण
हो गईं माँ ।
महागौरी
तब माँ कहलायीं !
नव दुर्गा का
आठवाँ रूप है ।
पूजा होती है
अष्टमी को
शांति और
सादगी की देवी
गौरी माँ की।
जनक -वाटिका में
देखा था -
सीता ने
लता-भवन से निकलते
श्याम –वर्ण
जो थे ...।
छवि उतरी थी
उनकी
आँखों से
ह्रदय-पटल में
सीता के ।
कहा सखी ने-
जो हैं सांवरे...
वह हैं राम...
संग हैं मुनि
और पीछे
अनुज भ्र्राता हैं ।
माँ गौरी की
पूजा- अर्चना
की थी जानकी ने
मन में बसे
हुए थे राम ...
पूरी हुई थी
मनोकामना
माँ गौरी की
अनुकंपा से ।
पूजतीं आ रही कुमारी
तब से माँ
महागौरी को ।

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