रविवार, 13 अक्टूबर 2013

..माँ दुर्गा नवमें स्वरूप में ... माँ सिद्धिधात्री


माँ सिद्धिधात्री  

जगदम्बा
आदि शक्ति ने
की थी कल्पना
सृष्टि रचने की ।
जल ही जल था
उसमें निकला
एक कमल था ।
प्रकट हुए जब
ब्रह्मा जी उससे
भार सौंप दिया
उनको सृष्टि
रचने का।
जग का पालन
करेंगे विष्णु ।
शिव संहार करेंगे
विघ्न-बाधाओं का।
प्रकट हुए
शिव और विष्णु
आदि शक्ति
माँ की इच्छा से ।
माँ  का कार्य
महा-विकट है
जब यह जाना
ब्रह्मा ने
डूब गए वो
गहन –चिंतन में


किया परामर्श
शिव –विष्णु से ।
नर-नारी के अभाव में
होगी कैसे यह सृष्टि ?
उठा यह प्रश्न
उनके मन में ।
गए शरण
वो माँ के।
असमंजस में देख
ब्रहमा को
आदिशक्ति ने
अपने अंश से
किया प्रकट
माँ सिद्धिधात्री को
और व्यक्त की
अपनी इच्छा-
यदि शिव करेंगे
साधना
इस देवी की
सारी सिद्धि
प्राप्त होगी शिव को ।
मार्ग प्रशस्त होगा
सृष्टि – रचना की।

महान साधना
जब शिव ने की
सिद्धि –सारी
प्राप्त हो गयी ।
कर दिया परिवर्तित
शिव के आधे-शरीर को
नारी- रूप में ।
अर्धनारिश्वर बने शिव ।
दिया सहयोग
ब्रह्मा को शिव ने
जगत रचने में।

माँ का रूप है बड़ा मनोहर ।
आसीन हैं कमल-पुष्प पर
चार –भुजाओं में सुसज्जित
गदा –चक्र , शंख –कमल है।
नव –रूपों की अंतिम देवी
नवमें दिन पूजी जाती हैं।
सिद्धि प्राप्त करते जो साधक
बहुजन हिताय की धारणा से
ज्ञान- गगन में करते विचरण
जनमानस आलोकित होता है ।






  















कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें