रविवार, 6 अक्टूबर 2013

प्रस्तुत है यह एक रचना... शराफत -भरी मुस्कान थी उसकी... प्रेमकुमार


शराफत -भरी मुस्कान थी उसकी ...


रही होगी कोई  वजह
सो नहीं सका रात में
समय फिर मिलता नहीं
निकल पड़ा घर से
मिलने एक मित्र से .
भीड़ थी ज्यादा
फिर भी चढ़ गया
डब्बे में
यों तो अगाह
कर दिया था
बिटिया ने
भीड़ होगी इस वक्त
टॅक्सी से जाइए ।

जाकर देखा अंदर
बैठा था एक युवक
वरिष्ठ नागरिक की
सीट पर ।

उठने को
ज्यों ही कहा
उसे
लगा
गाज़ गिर गया है
उस पर ।
अनमने ढ्ंग से उठा
और  अहसान
लाद दिया मुझ पर ।
आंखे
हो रही थी बोझिल
ज्यादा नहीं
सोचने दिया उसने ।

सामने मेरे
दो नवयुवक
और एक नवयुवती
कर रहे थे
बातें
आपस में ।
परेशान थे ।
लग गयी थी
ड्यूटी
सटरडे को भी।
और जाना होगा
संडे को भी ।
तब कहा
एक ने दूसरे से
संडे ड्यूटि क्या है ?
रहना
एक घंटा
ऑफिस में
फिर करना
शौपिंग –औपिंग
और वापिस
आ जाना ।
सुन रहा था
मैं ऊँघते-ऊँघते ।
पता नहीं कब
वह नवयुवती
बगल में मेरे
बैठ गयी थी ।
जब-जब
मैं बेकाबू होकर
झुक पड़ता
उसकी तरफ
उसके चौकस
हो जाने का
एहसास मुझे
हो जाता था ।
पर नींद थी
बड़ी भुल्लकर
छोटा –सा
यह शिष्टाचार भी
याद रखना
पसंद नहीं था ।
बार-बार
वही दुहरा रही थी ।

स्टेशन आने के
पहले ही
मैं सजग हो गया
और सीट छोड़ कर
सामने उसके
खड़ा हो गया ।
आंखे मिली जब
मेरी उससे
मैंने सौरी
कह दिया
एक मुस्कान की
भेंट दी मुझको
मैंने रख लिया
सहेज कर ।
जब देखा मुस्कान
उसका
साथी-युवक ने
थोड़ा-सा बेचैन
हो गया ।
लगी बताने जब
वह उसको
मैं उतरने को
तैयार था
साथ मेरे
उसकी  मुस्कान थी ।
वंचित हो जाता मैं
इस अनुपम अनुभूति से
यदि जाता मैं टॅक्सी से !














कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें