मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

मौसम जैसे बदलती हो तुम …

मौसम जैसे बदलती हो तुम


बदलती हो तुम  वैसे
मौसम जैसे बदलता है ।
जबसँवारती हों केशों को
घटा काली छा जाती है ।
गेंहुए रंग में साड़ी पीली
ऋतु बसंत जैसा लगता है ।
थोड़ी –सी मुस्कान तुम्हारी
शिशिर पंख फैला देता है ।
हो जाती हो जब तुम गुमसुम
हेमंत सिमट कर रह जाता है ।
दमकता है जब चेहरा गुस्से-से
भाग कर ग्रीष्म आ जाता है ।
मनुहारों से भींग जाती है जब नाराजगी

बिना मौसम बरसात होती है ।

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