मौसम जैसे बदलती हो तुम
…
बदलती हो तुम वैसे
मौसम जैसे बदलता है
।
जबसँवारती हों केशों को
घटा काली छा जाती है ।
गेंहुए रंग में साड़ी
पीली
ऋतु बसंत जैसा लगता
है ।
थोड़ी –सी मुस्कान
तुम्हारी
शिशिर पंख फैला देता
है ।
हो जाती हो जब तुम
गुमसुम
हेमंत सिमट कर
रह जाता है ।
दमकता है जब चेहरा
गुस्से-से
भाग कर ग्रीष्म आ
जाता है ।
मनुहारों से भींग
जाती है जब नाराजगी
बिना मौसम बरसात
होती है ।

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