कालरात्रि माँ …माँ दुर्गा जी
की सातवीं शक्ति
भयभीत हों दानव जैसे
माँ ने वैसा रूप धरा है ।
बाल बिखरे हैं ,
नील वर्ण है ,
आँखों से बाण
निकल
रहे हैं ।
अंगारे बरसाती है
मुंह से
बहती है नासिकाओं से
आँधी
हाथों में कटार
कांटा है
कंठ-हार से निकल रही
दामिनी
दानव –दल काँप रहे हैं
।
बड़ा विकराल रूप है
माँ का।
देवताओं के आवाहण पर
शक्ति का अदभूत रूप
प्रगट हुआ था ।
अमरता का वरदान लिए
रक्तबीज एक दानव था।
एक बूंद रक्त से
उसके
पैदा होंगे दानव
असंख्य ।
कौन करेगा साहस उसके
संहार का ?
देवताओं के गुहार पर
किया था माँ ने
संहार उसका
नहीं गिरा था धरा पर
एक बूंद भी रक्त का
।
लपलपाती लाल जिह्वा
में
लील लिया था
उसके रक्त को।
रक्तबीज माँ का ही
सम्बोधन है।
अज्ञान ही अंधकार है
जिसे दूर करती है
माँ ।
होगी जब कठिन साधना
तप- कर ज्ञान निखर
जाएगा
मिट जाएगा मन का
पिशाच
मन निर्भय हो जाएगा
।

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