गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

कालरात्रि माँ …माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति

कालरात्रि माँ माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति

भयभीत हों दानव जैसे
माँ ने वैसा रूप धरा है ।
बाल बिखरे हैं ,
नील वर्ण है ,
आँखों से बाण
निकल रहे हैं ।
अंगारे बरसाती है मुंह से
बहती है नासिकाओं से आँधी
हाथों में कटार कांटा है
कंठ-हार से निकल रही दामिनी
दानव –दल काँप रहे हैं ।
बड़ा विकराल रूप है माँ का।

देवताओं के आवाहण पर
शक्ति का अदभूत रूप
प्रगट हुआ था ।

अमरता का वरदान लिए
रक्तबीज एक दानव था।
एक बूंद रक्त से उसके
पैदा होंगे दानव असंख्य ।
कौन करेगा साहस उसके
संहार का ?
देवताओं के गुहार पर
किया था माँ ने
संहार उसका
नहीं गिरा था धरा पर
एक बूंद भी रक्त का ।
लपलपाती लाल जिह्वा में
लील लिया था
उसके रक्त को।
रक्तबीज माँ का ही
सम्बोधन है।

अज्ञान ही अंधकार है
जिसे दूर करती है माँ ।
होगी जब कठिन साधना
तप- कर ज्ञान निखर जाएगा
मिट जाएगा मन का पिशाच
मन निर्भय हो जाएगा ।








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