कहाँ- कहाँ ढूंढोगे रावण को ?
कोख में पलती बिटिया
को
जीवन मुक्त कर देता है रावण ।
छूटी नहीं मेंहदी
हाथ की
चिता सजा कर रख लेता
है ।
बन कर श्रवण
मात-पिता के
बैकुंठ- धाम भिजवा
देता है।
फंसा कर चंगुल में जानकी को
ख़ुदकुशी का तोहफा देता है ।
जहर फैला कर भेद-भाव का
घर एक-दूसरे से जलवा
देता है ।
बाजार गरम कर
अफवाहों का
भगदड़ बन कुचल देता
है ।
सभी धर्म के पवित्र
कुंड में
बारूद का शोला रखता
है ।
कहाँ- कहाँ ढूंढोगे
रावण को
रक्त-बीज –सा पैदा
होता है ।
काम-क्रोध-मोह-लोभ
का रावण
रूप अनेक संवार रहा
है ।
कहाँ- कहाँ ढूंढोगे
रावण को
हम –सब में अब समा
गया है ।

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