गुड़िया का निकाह
साथ गयी थी
अब्बू के ।
मेला घूमने
फूफी के घर
शहर में ।
देखा जेवर -
चमकदार कपड़े-
रखी
फूफी ने
सामने उसके
सज-धज कर
दरगाह जाना है
अल्लाह की दुआ
लेनी है –
कहा यह
फूफी ने उससे ।
सोचा उसने
अम्मी से
फूफी अच्छी है !
बहाना था केवल
नमाज का ।
सहमी-सी
उस बेजान को
निकाह कबूल
करवाया उसने ।
बैठा था
काजी के सामने
मालदार जो
साठ
साल का ।
इर्द-गिर्द
फैली –थी खुसबू
इत्र-फूलैल की ।
बिना घुमाए शहर
रुखसत किया
समझा-बुझा कर
अनजान गुड़िया को।
गाँव आकर
दावत की
तैयारी कर ली ।
लगा फटने
माँ का दिल जब
तलाक की
धमकी देकर
जश्न का माहौल
बनाया ।
सुना जब
दूसरे के अब्बू ने -
ऐसी किस्मत
निकली उसकी
सैर करेगी
हवा में।
तैयार हो गया
दूसरा अब्बू
गुड़िया का निकाह
करने को
लिया पता
उसकी फूफी का ।


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