सोमवार, 30 दिसंबर 2013

. विस्मृति

विस्मृति

प्रस्तुत है एक रचना.. विस्मृति.प्रेमकुमार

ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
घने बालों के साये में  ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
आँखों के पलकों में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
साँसों के प्रवाह  में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
मुस्कान के घेरे में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
दिल के एक कोने में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
कदमों की आहट में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
गीत के एक बोल में ।
ज़िंदगी एक  बीत गयी ,
मन के आँगन में ।
पर तुम कहती हो –
मुझे कुछ याद नहीं ।
यह कैसी विडम्बना है !
मेरी ढेरों - ज़िंदगी का
तुम्हारे पास हिसाब नहीं !

 30/12/2013




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