गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हे गोविंद ! आओ शरण

हे गोविंद ! आओ शरण ।

हे गोविंद !
आओ शरण ।
नया युग
दिखाऊँगी ।
माखन मिश्री से
ऊब गए  तुम
कटलेट  भोग लगाऊँगी ।
यमुना गंगा
तो हो गयी मैली
मिनरल वाटर पिलाऊँगी ।
ग्वाल-बाल संग खूब घूम लिए
मेट्रो में सैर  करवाऊँगी
लंच-डिनर की फिक्र नहीं अब
पाँच सितारा होटल में
अन्नकूट  मनाऊंगी ।
गोपियों को
अब कहाँ ढूंढोगे
गोवा –तट पे
रास नया  रचाऊंगी ।
बंसी तो खूब
बजा  चुके तुम
वेस्टर्न  म्यूजिक सुनवाऊंगी ।
डगर-डगर कहाँ जाओगे
पवन-हंस से
द्वारका पहुंचवा दूंगी ।
मीरा के गिरधर गोपाल
हे यशोदा नन्दन !
आदि-अनन्त हो
पर हो  अवतारी
जब जी चाहे
पधारो
द्वार म्हारो ।
इतनी-सी
विनती रख लेना
मीडिया को
खबर मत देना ।
न मना पाऊँगी तब
जन्म दिन तुम्हारा !
भीड़ लग जाएगी
संत-महात्मा –पंडा
सब एक हो जाएंगे
अपनी धरोहर समझ
उठा ले जाएंगे...









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