रविवार, 2 फ़रवरी 2014

आराधना. ...

 आराधना. ..



ज्ञान-गुरु
भारत बन जाए
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ भारती !

विवेकशील
प्राणी हों
सत्य-अहिंसा
अनुगामी हों ।
जन –कल्याण
कारी हों ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ भुवनेश्वरी !

स्वर-लहरी हों
अलग-अलग
संदेश एक
निकले ।
सागर –नदी
पर्वत –जंगल से
रूप-रंग
और बोली से
बंटे हैं इंसान
यदि
पर दिल एक
निकले ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ वागीश्वरी!

चन्द्रकिरण से
धुले मन
सबका
प्रेम –कमल खिले
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ चंद्रकांति !

सन्मति ऐसी
दे दे
मानव को ।
कर दें
जगमग
इस धरती को
विज्ञान के
दुर्लभ प्रकाश से ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ बुद्धिदात्री !

जीवन –संबंध


ऐसा बन जाए 


सब ही
अपने बन जाएँ
नीलकंठ हों
अमृत बांटे
जग ऐसा
तू रच दे
अभिलाषा है यह
मेरी
हे! वरदायिनी !

भय –संशय
तू मिटा दे
ह्रदय सबका
ममता से
भर दे
करुणामय संसार
बसा दे
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ शारदे !

शोषण के अस्त्र
न हों
अहं के वस्त्र
न हों
आस्था हो
मानव –धर्म में
बेल लगा दे
विद्या की ऐसी
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ सरस्वती !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें