आराधना.
..
ज्ञान-गुरु
भारत बन जाए
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ भारती !
विवेकशील
प्राणी हों
सत्य-अहिंसा
अनुगामी हों ।
जन –कल्याण
कारी हों ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ भुवनेश्वरी !
स्वर-लहरी हों
अलग-अलग
संदेश एक
निकले ।
सागर –नदी
पर्वत –जंगल से
रूप-रंग
और बोली से
बंटे हैं इंसान
यदि
पर दिल एक
निकले ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ वागीश्वरी!
चन्द्रकिरण से
धुले मन
सबका
प्रेम –कमल खिले
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ चंद्रकांति !
सन्मति ऐसी
दे दे
मानव को ।
कर दें
जगमग
इस धरती को
विज्ञान के
दुर्लभ प्रकाश से ।
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ बुद्धिदात्री
!
जीवन –संबंध
ऐसा बन जाए
सब ही
अपने बन जाएँ
नीलकंठ हों
अमृत बांटे
जग ऐसा
तू रच दे
अभिलाषा है यह
मेरी
हे! वरदायिनी !
भय –संशय
तू मिटा दे
ह्रदय सबका
ममता से
भर दे
करुणामय संसार
बसा दे
अभिलाषा है यह
मेरी
हे माँ शारदे !
शोषण के अस्त्र
न हों
अहं के वस्त्र
न हों
आस्था हो
मानव –धर्म में
बेल लगा दे
विद्या की ऐसी
अभिलाषा है यह
मेरी


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