रविवार, 9 फ़रवरी 2014

ओस की बूंदें

ओस की बूंदें

तारों  की छाँव में
बादलों के
 पंख पर 
आयी मैं उतर कर
इस धरा पर ।
लम्बा सफर था
थक गयी थी मैं
संभाला मुझे
छोटी-छोटी
दूबों ने
हरी –हरी
बाहों से
झूले में
झुलाया मुझे
पेडों की न जाने
कितनी पत्तियों ने ।
बिठाया मुझे
गोद में
फूलों की मखमली
पंखुरियों ने ।
प्यासी धरती ने
आँचल में
बसाया मुझे ।

थकावट मिटने को थी
पौ फटने  लगी
किर्णों ने आकर
लगाया गले
और
कहा कुछ
कानों में मेरे ।
बिठाया मुझे   
सुनहली डोली में
  ले गयी  मिलाने
  मुझे किसी से !
मिलूँगी जब उनसे
बताऊँगी कल !





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