ओस की बूंदें
तारों की छाँव
में
बादलों के
पंख पर
पंख पर
आयी मैं उतर कर
इस धरा पर ।
लम्बा सफर था
थक गयी थी मैं
संभाला मुझे
छोटी-छोटी
दूबों ने
हरी –हरी
बाहों से।
झूले में
झुलाया मुझे
पेडों की न जाने
कितनी पत्तियों ने ।
बिठाया मुझे
गोद में
फूलों की मखमली
पंखुरियों ने ।
प्यासी धरती ने
आँचल में
बसाया मुझे ।
थकावट मिटने को थी
पौ फटने लगी
किरर्णों ने आकर
लगाया गले
और
कहा कुछ
कानों में मेरे ।
बिठाया मुझे
सुनहली डोली में
ले गयी मिलाने
मुझे किसी से
!
मिलूँगी जब उनसे
बताऊँगी कल !




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