बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

प्रेम- पुष्प

प्रेम –दिवस के अवसर पर
प्रस्तुत है एक रचना.. प्रेम- पुष्प.. प्रेमकुमार



प्रेम- पुष्प

तस्वीर होती है
एक  जब
आँखों में,
शब्द गुम
हो जाते हैं,
सांस एक चलती है
ह्रदय दूसरा  
धड़कता है।
समर्पण की इस घड़ी में
प्रेम -पुष्प निकलते हैं ।

डाली पर बैठी
अलग –अलग
जब दो चिड़ियाँ
चहकती है
बात समझ
एक दूसरे की
साथ – साथ
उड़ जाती हैं
स्वीकृति की इस घड़ी में
प्रेम –पुष्प निकलते हैं ।

चाँद चूमने को जब लहरें
अथक प्रयास करती हैं
बार –बार उठ कर भी
बल खाकर गिरती हैं
फिर भी वे
सागर –तट आकर
प्रेम-गीत लिख देती हैं ।


देख घने
बादलों के झुरमुट
मयूर क्यों  थिरकते हैं ?

जेठ की तपती धरती
सावन की बाट
क्यों जोहती है ?

त्याग- समर्पण –प्रतीक्षा के
निर्मल जल में
शाश्वत प्रेम -कमल
खिलते हैं !


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