प्रेम –दिवस के अवसर
पर
प्रस्तुत है एक
रचना.. प्रेम- पुष्प.. प्रेमकुमार
प्रेम-
पुष्प
तस्वीर होती है
एक जब
आँखों में,
शब्द गुम
हो जाते हैं,
सांस एक चलती है
ह्रदय दूसरा
धड़कता है।
समर्पण की इस घड़ी
में
प्रेम -पुष्प निकलते
हैं ।
डाली पर बैठी
अलग –अलग
जब दो चिड़ियाँ
चहकती है
बात समझ
एक दूसरे की
साथ – साथ
उड़ जाती
हैं
स्वीकृति की इस घड़ी में
प्रेम –पुष्प निकलते
हैं ।
चाँद चूमने को जब
लहरें
अथक प्रयास करती हैं
बार –बार उठ कर भी
बल खाकर गिरती हैं
फिर भी वे
सागर –तट आकर
प्रेम-गीत लिख देती
हैं ।
देख घने
बादलों के झुरमुट
मयूर क्यों थिरकते हैं ?
जेठ की तपती धरती
सावन की बाट
क्यों जोहती है ?
त्याग- समर्पण –प्रतीक्षा के
निर्मल जल में
शाश्वत प्रेम -कमल
खिलते हैं !
खिलते हैं !


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें