प्रस्तुत है एक रचना.. मन के पंख..प्रेमकुमार
मन के पंख
शूलों से बिधें मन ने
कहा उदास होकर
मुझे
ले चलो कहीं
जगह ऐसी
जहाँ
पंख मेरे
फरफरा सके
हवा लजा गयी हो
लहरें गा रही हो
लोरी
चाँद आधा हो
सितारे दो-चार
बादल के कुछ
टुकड़े हों
बर्फ की नदी हो
आइसबर्ग इकट्ठे
मेरे पास हो ।
बात उसकी पूरी
हुई नहीं
धमाके
तरह-तरह के
जगह –जगह
होने लगे ।
वह ऐसे
आघात से
स्वयं फिर दब गया।
पंख उसके ऐसे जले
फरफराने
लायक न रहा !



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